21 जुलाई से श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का शुभारंभ, 29 जुलाई गुरु पूर्णिमा पर होगा समापन।
SHIKHAR DARPANSunday, July 19, 2026
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मधुबन,शिखर दर्पण संवाददाता।
गुणायतन तीर्थराज श्री सम्मेदशिखरजी में राष्ट्रसंत मुनि 108 प्रमाणसागर महाराज एवं मुनि 108 संधानसागर महाराज ससंघ सान्निध्य में 21 जुलाई से 108 मंडलों के साथ सिद्धचक्र महामंडल विधान का शुभारंभ होगा। नौ दिवसीय यह आराधना 29 जुलाई (गुरु पूर्णिमा) तक चलेगी। समापन अवसर पर चातुर्मास कलश स्थापना होगी तथा इसी दिन मुनि संधानसागर महाराज का 12वाँ दीक्षा दिवस भी श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा। प्रवक्ता अविनाश जैन 'विद्यावाणी' ने बताया कि विधान में देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है। शनिवार को आयोजित शंका समाधान कार्यक्रम में राष्ट्रसंत मुनि प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि "दीपक बाहरी नहीं, अंतःप्रकाश का प्रतीक है। चकाचौंध नहीं, ज्ञान का दीप ही जीवन को सही दिशा देता है।" उन्होंने कहा कि कृत्रिम चमक क्षणिक होती है, जबकि ज्ञान का प्रकाश जीवनभर मार्गदर्शन करता है। हमारा लक्ष्य बाहर दीप जलाने से अधिक अपने भीतर के अज्ञान को दूर कर आत्मप्रकाश जगाना होना चाहिए। अखंड ज्योति के विषय में मुनिश्री ने कहा कि जैन दर्शन के अनुसार संसार की कोई भी लौ अखंड नहीं है। यदि कोई अखंड ज्योति है तो वह केवलज्ञान की ज्योति है।
उन्होंने वर्षाकाल में दीपक के प्रयोग में विशेष सावधानी बरतने की प्रेरणा देते हुए कहा कि दीपक की लौ पर सूक्ष्म जीव आकर्षित होकर हिंसा का कारण बनते हैं। इसलिए आरती के दीपक में उतना ही घी रखें जितना आवश्यक हो और उसे अनावश्यक रूप से जलता न छोड़ें। इसी अवसर पर मुनि ने सम्मेदशिखर वंदना के महत्व पर कहा कि यह केवल पर्वतारोहण नहीं, बल्कि तप, संकल्प और सिद्धत्व की साधना है। बड़े पुण्य के उदय से ही इस दिव्य वंदना का अवसर प्राप्त होता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि जब शिखर तक पहुँच ही जाएँ तो पूरी श्रद्धा और दृढ़ संकल्प के साथ संपूर्ण वंदना करें, किसी भी टोंक की वंदना अधूरी न छोड़ें। उन्होंने कहा कि वंदना शरीर से अधिक मन की शक्ति का विषय है। यदि पहले से यह संकल्प कर लिया जाए कि पूरी वंदना करनी है, तो कठिन मार्ग भी सहज हो जाता है। जब तक शरीर समर्थ हो, पैदल वंदना करने का प्रयास करें, क्योंकि तप और परिश्रम से ही तीर्थयात्रा का वास्तविक आध्यात्मिक आनंद प्राप्त होता है। मुनि ने कहा कि धर्म केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि विवेक, अहिंसा और सजगता का नाम है। जब आस्था के साथ आत्मप्रकाश, तप और करुणा का समन्वय होगा, तभी धर्म का वास्तविक उद्देश्य पूर्ण होगा।