मधुबन स्थित गुणायतन में संत शिरोमणि आचार्य गुरुदेव विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद एवं मुनि प्रमाण सागर महाराज तथा मुनि संधान सागर महाराज ससंघ के सान्निध्य में आयोजित पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव का भव्य समापन भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) के मोक्ष कल्याणक के साथ श्रद्धा और भक्ति के वातावरण में संपन्न हुआ। अंतिम दिवस कैलाश पर्वत की आकर्षक रचना की गई, जिसके शिखर पर भगवान आदिनाथ की प्रतिमा विराजमान की गई।प्रतिष्ठाचार्य अशोक भैया एवं अभय भैया ने निर्वाण कल्याणक का भावपूर्ण मंचन किया।
इसके बाद हवन, अभिषेक, कलशारोहण और भव्य शोभायात्रा का आयोजन हुआ, जिसमें देशभर से आए हजारों श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लेकर धर्मलाभ प्राप्त किया। अंत में 108 भगवानों का अभिषेक कर उन्हें पारसधाम जिनालय में विराजमान कराया गया। इस अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि प्रत्येक जीव का परम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति होना चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल मुक्ति की इच्छा पर्याप्त नहीं, बल्कि भगवान द्वारा बताए गए संयम, तप, साधना और आराधना के मार्ग पर चलना आवश्यक है।
मुनि ने कहा, "मुक्ति का लक्ष्य तभी मिलेगा, जब जीवन में भक्ति, अनुरक्ति और विरक्ति आएँ। भक्ति से भगवान के प्रति अनुरक्ति उत्पन्न होती है और अनुरक्ति से संसार के प्रति विरक्ति विकसित होती है। यही विरक्ति अंततः मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।" उन्होंने श्रद्धालुओं से आत्मचिंतन करने का आह्वान करते हुए कहा कि जीवन में केवल सांसारिक बंधनों को नहीं, बल्कि आत्मा को बांधने वाले कर्मों को भी पहचानना होगा। धर्म का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देता है, जब जीवन से दोष और दुर्गुण दूर हों तथा श्रद्धा, क्षमाशीलता, उदारता और सद्गुणों का विकास हो।भगवान आदिनाथ के निर्वाण प्रसंग का उल्लेख करते हुए मुनि श्री ने कहा कि भरत चक्रवर्ती भगवान के मोक्ष पर इसलिए नहीं रोए कि वे मुक्त हो गए, बल्कि इसलिए कि अब उन्हें भगवान के दर्शन और उपदेश का सौभाग्य नहीं मिलेगा। यही प्रभु के प्रति सच्ची भक्ति और अनुरक्ति का स्वरूप है।मुनि श्री ने पंचकल्याणक महोत्सव में सेवा देने वाले गुणायतन परिवार, सभी कार्यकर्ताओं एवं मीडिया प्रतिनिधियों को आशीर्वाद देते हुए कहा कि महोत्सव के बाद भी सभी अपने जीवन में संयम, साधना और धर्म को अपनाकर सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करें।


