गुणायतन श्री सम्मेद शिखर तीर्थराज में आयोजित श्री जिनबिंब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव के चौथे दिन भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ भगवान) के तप एवं दीक्षा कल्याणक का भव्य आयोजन पूज्य मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज एवं मुनि श्री संधान सागर महाराज ससंघ के सानिध्य में श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न हुआ। इस दौरान भगवान आदिनाथ के वनगमन एवं दीक्षा ग्रहण के भावपूर्ण दृश्यों का मंचन किया गया, जिसने उपस्थित श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्या वाणी ने बताया कि प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी अशोक भैया एवं अभय भैया के निर्देशन में प्रातःकाल राज्याभिषेक की धार्मिक क्रियाएं संपन्न हुईं। कार्यक्रम में राजा आदिकुमार द्वारा प्रजा को कृषि, वाणिज्य, शिल्पकला एवं शस्त्र संचालन की शिक्षा देने का भी जीवंत मंचन किया गया। कार्यक्रम का सबसे भावुक क्षण तब आया जब स्वर्ग की अप्सरा नीलांजना के नृत्य के दौरान उसकी आयु पूर्ण होने पर मृत्यु का दृश्य प्रस्तुत किया गया।
इस घटना से राजा आदिकुमार को संसार की नश्वरता का बोध हुआ और उन्होंने राजवैभव त्यागकर आत्मकल्याण के लिए वनगमन कर दीक्षा ग्रहण करने का संकल्प लिया। धर्मसभा को संबोधित करते हुए राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि "दृढ़ संकल्प में जीवन को बदल देने की अद्भुत शक्ति होती है।" उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन की सार्थकता संस्कार, सम्यक्त्व, संयम और साधना में निहित है। आत्मकल्याण का मार्ग संकल्प, संयम, साधना और सिद्धि के चार सोपानों से होकर गुजरता है। उन्होंने कहा कि केवल कल्याण की इच्छा पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके लिए दृढ़ संकल्प और निरंतर पुरुषार्थ आवश्यक है। संकल्प ही सिद्धि का बीज है और दृढ़ निश्चयी व्यक्ति कठिन से कठिन बाधाओं को भी पार कर सकता है। मुनि श्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि आत्मकल्याण की वास्तविक इच्छा व्यक्ति के आचरण से झलकती है।
यदि दिगंबर मुनि बनने का संकल्प संभव न हो तो संयममय जीवन अपनाएं, वह भी कठिन लगे तो धर्ममय जीवन जिएं और कम से कम अधर्म से दूर रहने का दृढ़ निश्चय अवश्य करें। उन्होंने कहा कि मनुष्य के साथ अंततः केवल उसके कर्म ही जाते हैं। इसलिए धर्म, संयम और साधना को जीवन का आधार बनाना चाहिए। संकल्प के बाद संयम सबसे महत्वपूर्ण चरण है, जिसमें क्रोध, लोभ, मान, माया और मोह जैसी कषायों पर नियंत्रण आवश्यक है।प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि पूर्णिमा के अवसर पर प्रातः 5 बजे से मांगलिक क्रियाओं का आयोजन होगा। मुनि श्री के मुखारविंद से 1008 प्रभु नामों के स्मरण के साथ 55 मिनट की विशेष शांतिधारा संपन्न होगी। इसके बाद देशना एवं भगवान की आहारचर्या निकलेगी, जिसमें राजा श्रेयांस एवं राजा सोम द्वारा इक्षुरस से आहार ग्रहण कराने के ऐतिहासिक प्रसंग का मंचन किया जाएगा।


