समाहरणालय सभागार में CMAM/समर कार्यक्रम को लेकर समीक्षा सह प्रशिक्षण, शिशु कुपोषण रोकथाम पर जोर।
SHIKHAR DARPANTuesday, April 07, 2026
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गिरिडीह,शिखर दर्पण संवाददाता।
समाहरणालय सभागार में समर (CMAM) कार्यक्रम के अंतर्गत 0-06 माह के शिशुओं में कुपोषण के खतरे की पहचान एवं प्रबंधन को लेकर समीक्षात्मक बैठक सह प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य जिले में कुपोषण की समस्या को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करना और शिशुओं के स्वास्थ्य में सुधार लाना था। बैठक में संबंधित विभागों के पदाधिकारी, स्वास्थ्य कर्मी, आंगनबाड़ी सेविकाएं एवं बाल विकास परियोजना से जुड़े कर्मी उपस्थित रहे। इस दौरान समर/CMAM कार्यक्रम की वर्तमान स्थिति की समीक्षा की गई तथा शिशुओं में कुपोषण के शुरुआती लक्षणों की पहचान पर विशेष जोर दिया गया। सिविल सर्जन ने बताया कि जन्म से छह माह तक का समय शिशु के शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इस अवधि में उचित पोषण, नियमित स्वास्थ्य जांच और समय पर उपचार अनिवार्य है।
प्रशिक्षण सत्र में कुपोषण के कारण, पहचान के तरीके, वजन और ऊंचाई की नियमित मॉनिटरिंग, स्तनपान की भूमिका तथा माताओं को जागरूक करने के उपायों पर विस्तार से जानकारी दी गई। उन्होंने कहा कि CMAM (Community Based Management of Acute Malnutrition) के तहत कुपोषित शिशुओं की समय पर पहचान कर उन्हें आवश्यक पोषण, चिकित्सीय परामर्श एवं निरंतर निगरानी प्रदान करना जरूरी है। गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों को नजदीकी स्वास्थ्य केंद्रों में रेफर करने और उनका नियमित फॉलोअप सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए गए। बैठक में जिला समाज कल्याण पदाधिकारी ने निर्देश दिया कि आंगनबाड़ी केंद्रों और स्वास्थ्य संस्थानों के माध्यम से गांव-गांव तक जागरूकता अभियान चलाया जाए, ताकि माताओं और अभिभावकों को शिशु पोषण, स्तनपान एवं स्वच्छता के प्रति जागरूक किया जा सके।
साथ ही सभी प्रखंडों में कार्यक्रम के प्रभावी क्रियान्वयन, नियमित समीक्षा और रिपोर्टिंग सुनिश्चित करने पर बल दिया गया। कार्यक्रम के दौरान बताया गया कि राज्य में 06 माह से कम उम्र के बच्चों में कुपोषण एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। इसलिए जन्म से ही सही पोषण, केवल स्तनपान, समय पर टीकाकरण एवं स्वच्छता पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। प्रशिक्षण में यह भी बताया गया कि 0-06 माह के शिशुओं में कुपोषण के खतरे का प्रबंधन पांच चरणों में किया जाएगा, जिसमें पहचान, वर्गीकरण, प्रबंधन स्तर का निर्धारण, देखभाल एवं फॉलोअप शामिल है। कार्यक्रम के अंत में सभी संबंधित अधिकारियों और कर्मियों को समन्वित प्रयास के साथ कार्य करते हुए जिले को कुपोषण मुक्त बनाने का संकल्प दिलाया गया।