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श्री सम्मेदशिखर में ऐतिहासिक क्षण — मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने प्रदान की तीन निर्ग्रंथ जैनेश्वरी मुनि दीक्षा।

गिरिडीह,शिखर दर्पण संवाददाता।

अनिलेश गौरव

जैन धर्म के विश्व प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री सम्मेद शिखरजी की पावन और वंदनीय भूमि पर शनिवार का दिन ऐतिहासिक बन गया, जब पूज्य मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने भव्य धार्मिक वातावरण में तीन साधकों को निर्ग्रंथ जैनेश्वरी मुनि दीक्षा प्रदान की। इस दिव्य अवसर पर देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित होकर इस आध्यात्मिक क्षण के साक्षी बने।दीक्षा के उपरांत ब्रह्मचारी सारांश भैया मुनि श्री 108 सारसागर महाराज, क्षुल्लक समादर सागर मुनि श्री 108 समादरसागर महाराज तथा बाल ब्रह्मचारी रुपेश भैया मुनि श्री 108 रुपसागर महाराज के रूप में दीक्षित हुए। यह दीक्षा समारोह इसलिए भी विशेष रहा क्योंकि एक मुनिराज द्वारा दूसरे मुनिराज को दीक्षा प्रदान करने की परंपरा का सजीव उदाहरण देखने को मिला।

दीक्षा प्रदान करने के बाद अपने प्रवचन में मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने नवदीक्षित मुनिराजों को संबोधित करते हुए कहा कि साधु जीवन का मूल उद्देश्य आत्मशुद्धि और मोक्ष प्राप्ति है।

उन्होंने कहा कि साधु बनने के बाद संसार के आकर्षण, सम्मान, आलोचना या प्रशंसा जैसी स्थितियाँ सामने आती हैं, लेकिन एक सच्चा साधु इन सबसे ऊपर उठकर केवल अपने आत्मकल्याण पर केंद्रित रहता है। “मैं साधु बना हूँ न पूजा पाने के लिए, न समाज से संरक्षण पाने के लिए, बल्कि अपने जीवन को पवित्र बनाने और मोक्ष-पथ को साधने के लिए,” यह संदेश उन्होंने विशेष रूप से दिया।उन्होंने भगवान महावीर से लेकर आचार्य कुंदकुंद और आचार्य विद्यासागर महाराज की महान परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि साधु का मार्ग त्याग, संयम और अनुशासन से परिपूर्ण होता है। उन्होंने बताया कि वे कोई नया कार्य नहीं कर रहे हैं, बल्कि वही दायित्व निभा रहे हैं जो उन्हें वर्ष 2019 में नेमावर में उनके गुरुदेव द्वारा सौंपा गया था। दीक्षा से पूर्व इन युवाओं ने ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण कर वर्ष 2020 से निरंतर साधना, तप और संयम के माध्यम से अपने जीवन को तैयार किया। मुनि श्री ने कहा कि एक साधु का वास्तविक आधार लोगों की प्रशंसा नहीं, बल्कि 28 मूलगुणों की रक्षा और पंचाचार का पालन है। एक श्रेष्ठ शिष्य अपने जीवन को गुरु के हाथों में इस प्रकार समर्पित कर देता है, जैसे बांसुरी अपने वादक के हाथों में होती है।

दीक्षा समारोह के दौरान विधि-विधान के साथ पंचमुष्टि केशलोंच एवं पंचगुरु भक्ति संपन्न कराई गई। वस्त्र त्याग का दृश्य अत्यंत भावुक और पावन रहा, जिसने उपस्थित श्रद्धालुओं को गहराई से भावविभोर कर दिया। नवदीक्षित मुनिराजों को पिच्छिका, शास्त्र एवं कमंडल भेंट किए गए। प्रातःकाल नवदीक्षार्थियों की भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और गुरु भक्ति में लीन रहे। कार्यक्रम का संचालन बाल ब्रह्मचारी अशोक भैया लिधोरा एवं अभय आदित्य ने किया, जबकि संघस्थ मुनि श्री संधान सागर महाराज ने नवदीक्षित मुनिराजों का जीवन परिचय प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का ध्वजारोहण भामाशाह अशोक पाटनी एवं श्रीमती सुशीला पाटनी द्वारा किया गया। इस अवसर पर विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे। इस ऐतिहासिक अवसर पर मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक समेत देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु पहुंचे। वहीं अमेरिका के ह्यूस्टन, बैंकॉक और सिंगापुर से भी श्रद्धालुओं की सहभागिता रही। सायंकाल शंका समाधान कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें श्रद्धालुओं ने अपने प्रश्न रखे और मुनि श्री से समाधान प्राप्त किया।समारोह में उमड़ी अपार भीड़ और श्रद्धालुओं की आस्था ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा, भक्ति और उल्लास से ओतप्रोत कर दिया, जिससे यह आयोजन सदैव के लिए स्मरणीय बन गया।

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