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भावों का रूपांतरण ही जीवन परिवर्तन की कुंजी : मुनि प्रमाण सागर।

गिरिडीह,शिखर दर्पण संवाददाता।

राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने धर्मसभा में कहा कि “भावों को रूपांतरित करें, जीवन स्वयं बदल जाएगा।” उन्होंने कहा कि भाव ही जीवन का निर्माण करते हैं और व्यक्ति के भाग्य का निर्धारण भी उसके भावों से होता है। इसलिए नकारात्मक भावों को दबाने के बजाय उनका सकारात्मक रूपांतरण करना सीखना चाहिए। गुणायतन के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि मुनि श्री ने कहा कि क्रोध को करुणा, घृणा को प्रेम, अहंकार को आत्मीयता, लोभ को संतोष और माया को सरलता में बदलना ही भावों की सच्ची साधना है। उन्होंने भावों के रूपांतरण के लिए तीन प्रमुख उपाय बताए। पहला, व्यक्ति अपने भीतर उठने वाले क्रोध और अन्य विकारों का द्रष्टा बने। भाव से लड़ने या उसके साथ बहने के बजाय उसे सजगता से देखे। दूसरा, नकारात्मक भावों की दिशा सकारात्मक कार्यों की ओर मोड़े।

अच्छा साहित्य पढ़ना, आध्यात्मिक बातें सुनना और उपयोगी कार्यों में मन लगाना इसमें सहायक हो सकता है।तीसरे उपाय के रूप में उन्होंने सकारात्मक आत्म-सुझाव को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि शांत अवस्था में व्यक्ति को बार-बार संकल्प लेना चाहिए— “मुझे शांत रहना है, मुझे संयम रखना है, मुझे सहज रहना है और मुझे प्रसन्न रहना है।” निरंतर अभ्यास से ये विचार मन में मजबूत होते जाते हैं। मुनि श्री ने आधुनिक तकनीक के एल्गोरिदम का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार बार-बार देखी जाने वाली सामग्री डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दोबारा दिखाई देती है, उसी प्रकार बार-बार दोहराए गए विचार मस्तिष्क में अपनी दिशा मजबूत करते हैं। इसलिए मन को शांति, संयम और सकारात्मकता की ओर प्रशिक्षित करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि भाव बदलेंगे तो विचार बदलेंगे, विचार बदलेंगे तो व्यवहार बदलेगा और व्यवहार बदलने से जीवन की दिशा स्वयं बदल जाएगी। इसके लिए नियमित भावनायोग और निरंतर अभ्यास आवश्यक है।

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