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क्रोध, लोभ, उपहास और बुरी आदतों से बचकर मधुर व्यवहार अपनाएँ मुनि प्रमाणसागर महाराज।

मधुबन,शिखर दर्पण संवाददाता।

राष्ट्रसंत मुनि प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि मधुर व्यवहार केवल मीठे शब्दों से नहीं, बल्कि मन की शुद्धता, आत्मसंयम और श्रेष्ठ संस्कारों से विकसित होता है। क्रोध, लोभ, भय, उपहास, अनियंत्रित मज़ाक और बुरी आदतें व्यक्ति की वाणी और व्यवहार की मधुरता को नष्ट कर देती हैं। इन पर नियंत्रण रखकर ही व्यक्ति अपने व्यक्तित्व को श्रेष्ठ बना सकता है। मुनिश्री ने कहा कि एक ही शब्द प्रेम से बोला जाए तो हृदय को स्पर्श करता है, जबकि वही शब्द क्रोध में बोले जाने पर गहरा आघात पहुँचाता है। शब्द नहीं बदलते, उनके पीछे के भाव बदल जाते हैं। उन्होंने कहा, "क्रोध की शुरुआत अविवेक से होती है और उसका अंत सदैव पश्चाताप में होता है।" इसलिए व्यवहार शुद्धि के लिए सबसे पहले क्रोध पर नियंत्रण आवश्यक है। उन्होंने कहा कि लोभ भी मनुष्य की वाणी और व्यवहार को दूषित कर देता है। स्वार्थ से प्रेरित व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार अपनी भाषा बदल लेता है। अकबर-बीरबल के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने समझाया कि लाभ के लिए बोली गई मधुरता वास्तविक नहीं होती। मधुर व्यवहार के साथ निष्कपटता और सत्यनिष्ठा भी आवश्यक है। उन्होंने आगाह किया कि कृत्रिम मिठास कई बार छल का माध्यम बन जाती है, इसलिए सजग रहना चाहिए।

मुनिश्री ने कहा कि भयभीत व्यक्ति भी सत्य नहीं बोल पाता। डर मनुष्य से आत्मविश्वास छीन लेता है। इसलिए निर्भीकता और सत्य का पालन श्रेष्ठ व्यवहार की आधारशिला है। व्यवहार शुद्धि के संदर्भ में उन्होंने मर्यादित विनोद पर बल देते हुए कहा कि अनियंत्रित मज़ाक और उपहास संबंधों में कटुता, अपराधबोध और कर्मबंधन का कारण बन जाते हैं। "किसी के साथ हँसिए, लेकिन किसी पर मत हँसिए।" विनोद तभी तक उचित है, जब तक वह किसी के सम्मान और आत्मसम्मान को ठेस न पहुँचाए। जिस व्यक्ति को मज़ाक पसंद न हो, उसके साथ परिहास नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य की आदतें उसकी संगति और वातावरण से निर्मित होती हैं। यदि अच्छी आदतें विकसित करनी हैं तो श्रेष्ठ लोगों का साथ अपनाना होगा। यदि अपशब्द बोलने या कटु भाषा की आदत पड़ गई हो तो उसे जागरूकता और दृढ़ संकल्प से बदला जा सकता है। मुनिश्री ने अपशब्दों की आदत छोड़ने के लिए चार प्रभावी उपाय बताए—पहला, किसी आत्मीय व्यक्ति की सहायता लें, जो गलती होने पर तुरंत सचेत कर सके।

दूसरा, प्रतिदिन प्रातः आत्मसंकल्प करें कि आज मधुर, सत्य और सुंदर वाणी ही बोलनी है तथा प्रभु से वाणी में माधुर्य की प्रार्थना करें। तीसरा, यदि भूलवश अपशब्द निकल जाए तो स्वयं को अनुशासित करें, पश्चाताप करें तथा प्रायश्चित स्वरूप नवकार मंत्र का जाप करें। चौथा और सबसे महत्वपूर्ण उपाय यह है कि जिससे कठोर शब्द कहे हों, उससे तुरंत क्षमा मांगें और अपनी भूल स्वीकार करें।मुनिश्री ने कहा कि सच्चा परिवर्तन बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि भीतर की जागरूकता और आत्मानुशासन से आता है। जो व्यक्ति अपनी वाणी पर संयम रखता है, अपनी गलतियों को स्वीकार कर उन्हें सुधारने का साहस करता है, वही व्यवहार की शुद्धि प्राप्त कर सकता है। मुनि प्रमाण सागर महाराज ने आज केशलोंच किया तथा उपवास रहा। गुणायतन में प्रतिदिन प्रातः 7:30 बजे शांतिधारा, 8:30 बजे धर्मसभा एवं प्रवचन तथा सायं 6:15 बजे शंका समाधान का नियमित आयोजन किया जा रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु सहभागिता कर धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं।

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