परिस्थितियों को नहीं, अपनी दृष्टि को शुद्ध करें" :राष्ट्रसंत मुनि प्रमाण सागर महाराज।
SHIKHAR DARPANSunday, August 30, 2026
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मधुबन,शिखर दर्पण संवाददाता।
हमारे जीवन में प्रतिदिन बहुत कुछ घटित होता है।प्रत्येक घटना को व्यक्ति अपने-अपने नजरिए से देखता है और उसी दृष्टिकोण के आधार पर सुख अथवा दुःख का अनुभव करता है।एक ही परिस्थिति किसी व्यक्ति के लिए परेशानी बन जाती है,जबकि वही परिस्थिति दूसरे व्यक्ति के लिए सीख और आत्मविकास का अवसर सिद्ध हो सकती है। जीवन में घटने वाली घटनाओं से अधिक महत्वपूर्ण उन्हें देखने का हमारा दृष्टिकोण है।उक्त विचार राष्ट्रसंत मुनि प्रमाण सागर महाराज ने दर्शन विशुद्धि भावना विषय पर धर्म सभा में व्यक्त किया । सोलह कारण भावनाओं पर दर्शन विशुद्धी भावना पर विचार व्यक्त करते हुये मुनि श्री ने कहा कि सामान्यतः मनुष्य अपने जीवन में आने वाली प्रतिकूल परिस्थितियों में वास्तविक कारणों को खोजने के बजाय उनके लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराने लगता है।हमें ऐसा लगता है कि हमारे जीवन में जो कुछ भी हो रहा है,वह किसी दूसरे व्यक्ति अथवा बाहरी परिस्थितियों की वजह से हो रहा है। यही सोच व्यक्ति को अपने जीवन की जिम्मेदारी स्वीकार करने से दूर कर देती है। मुनि श्री ने कहा कि जब तक व्यक्ति अपनी परिस्थितियों को समझने और उनके वास्तविक कारणों की खोज करने का प्रयास नहीं करता, तब तक वह जीवन की समस्याओं का सही समाधान नहीं पा सकता।
मुनि श्री ने कहा कि दूसरों को दोष देना आसान है, लेकिन अपने भीतर झांकना कठिन है।व्यक्ति अपने दुखों और असफलताओं का कारण परिवार, समाज, व्यवस्था अथवा किसी व्यक्ति को मान लेता है, लेकिन जब वहआत्मचिंतन करता है तो उसेअपनी अपेक्षाएं, निर्णय, कमजोरियां और दृष्टिकोण भी दिखाई देने लगते हैं।उन्होंने कहा कि दर्शन विशुद्धि भावना का अर्थ केवल धार्मिक सिद्धांतों को जान लेना नहीं, बल्कि जीवन को सही दृष्टि से देखना भी है।जब हमारी दृष्टि विकृत होती है तो हमें हर व्यक्ति और हर परिस्थिति में दोष दिखाई देता है।मन पूर्वाग्रहों से भर जाता है और व्यक्ति छोटी-छोटी घटनाओं को भी अपने दुख का कारण मानने लगता है।इसके विपरीत जब दृष्टि निर्मल होती है तो व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सीख और आगे बढ़ने का अवसर खोज लेता है।मुनि प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि हम प्रायः चाहते हैं कि परिस्थितियां हमारे अनुकूल हो जाएं, लोग हमारी अपेक्षाओं के अनुसार व्यवहार करें और संसार हमारी इच्छानुसार चलने लगे। लेकिन संसार को बदलना हमारे हाथ में नहीं है। हमारे हाथ में केवल अपनी दृष्टि,अपने विचार और अपनी प्रतिक्रिया को बदलना है।वास्तविक परिवर्तन बाहर से नहीं, भीतर से प्रारंभ होता है।उन्होंने कहा कि एक ही घटना किसी व्यक्ति को तोड़ देती है और किसी दूसरे व्यक्ति को मजबूत बना देती है।इसका कारण घटना नहीं, बल्कि उस घटना के प्रति व्यक्ति की दृष्टि होती है।इसलिए जब भी जीवन में कोई विपरीत परिस्थिति आए, तो तुरंत किसी को दोषी ठहराने के बजाय स्वयं से पूछें कि मैं इस परिस्थिति को किस दृष्टि से देख रहा हूं? क्या मैं केवल शिकायत कर रहा हूं या इससे कुछ सीखने का प्रयास भी कर रहा हूं? मुनि श्री ने कहा कि दोषारोपण से मन में क्रोध, शिकायत और कटुता बढ़ती है, जबकि आत्मचिंतन से समाधान का मार्ग खुलता है।
जो व्यक्ति अपनी भूलों और कमियों को स्वीकार कर लेता है,उसके जीवन में सुधार की संभावना प्रारंभ हो जाती है।अपनी जिम्मेदारी से बचने वाला व्यक्ति परिस्थितियों का गुलाम बन जाता है,जबकि अपनी दृष्टि को शुद्ध करने वाला व्यक्ति परिस्थितियों के बीच भी संतुलित रहना सीख लेता है। उन्होंने कहा कि "दर्शन विशुद्धि" व्यक्ति को जीवन की वास्तविकता को समझने की शक्ति प्रदान करती है।"व्यक्ति को चाहिए कि वह सत्य को सत्य रूप में स्वीकार करे और अपनी अपेक्षाओं तथा पूर्वाग्रहों के चश्मे से संसार को देखना बंद करे" दूसरों के व्यवहार के आधार पर अपने सुख-दुःख का निर्धारण करने के बजाय अपने भावों की जिम्मेदारी स्वयं स्वीकार करनी चाहिए। मुनि श्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि जीवन में जब भी कोई घटना घटे तो तत्काल प्रतिक्रिया देने से पहले कुछ क्षण रुककर आत्मचिंतन करें। परिस्थितियों के लिए किसी और को दोषी ठहराने से पहले स्वयं के भीतर झांकें। संभव है कि जिस समस्या के लिए हम दूसरों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं,उसका समाधान हमारी अपनी सोच और दृष्टिकोण में छिपा हो। उन्होंने कहा कि परिस्थितियां हमेशा हमारे अनुकूल नहीं हो सकतीं, लेकिन उनके प्रति हमारा दृष्टिकोण अवश्य हमारे हाथ में है। जब दर्शन विशुद्ध होता है तो विचार शुद्ध होते हैं, विचार शुद्ध होते हैं तो भाव निर्मल बनते हैं और निर्मल भाव ही जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं। जीवन को बदलने के लिए सबसे पहले जीवन को देखने का तरीका बदलना होगा।मुनि श्री ने कहा कि बाहर की दुनिया को बदलने का प्रयास करने से पहले व्यक्ति अपने भीतर की दृष्टि को निर्मल बनाए। परिस्थितियां बदलें या न बदलें, लेकिन यदि दृष्टि बदल जाए तो जीवन को देखने और जीने का तरीका अवश्य बदल सकता है। यह जानकारी अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’, राष्ट्रीय प्रवक्ता, गुणायतन ने दी।