संसार से डरकर मत जियो, डटकर जियो : मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज।
SHIKHAR DARPANSunday, August 23, 2026
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मधुबन,शिखर दर्पण संवाददाता।
गुणायतन में आयोजित धर्मसभा में राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने श्रद्धालुओं को भय छोड़कर आत्मविश्वास और जागरूकता के साथ जीवन जीने का संदेश दिया। उन्होंने कहा, “संसार से डरकर मत जियो, संसार के बंधनों से सजग रहो। भागना पलायन है, भोगना बेबसी है और जागना जीवन की वास्तविक चेतना है।”मुनिश्री ने कहा कि जीवन में सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय और संयोग-वियोग जैसी परिस्थितियां आती-जाती रहती हैं। संसार परिवर्तनशील है, इसलिए व्यक्ति को परिस्थितियों से डरने के बजाय आत्मविश्वास के साथ उनका सामना करना चाहिए। उन्होंने कहा कि संसार से भागना कोई समाधान नहीं है। व्यक्ति बाहरी संसार से दूर चला जाए, लेकिन यदि उसके भीतर संसार बसा है तो उसे वास्तविक सुख नहीं मिल सकता। सुखी जीवन का सूत्र बताते हुए उन्होंने कहा, “तुम संसार में रहो, तुममें संसार न रहे।” सोलह कारण भावनाओं की पांचवीं भावना ‘अभिक्षण संवेग’ की चर्चा करते हुए मुनिश्री ने कहा कि केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है, ज्ञान के साथ वैराग्य और जागरूकता भी आवश्यक है। संसार में डरना और संसार के बंधनों से सजग रहना दोनों अलग बातें हैं। भय व्यक्ति की आंतरिक कमजोरी है, जो आत्मविश्वास को कमजोर करता है।
*परिस्थितियों से भागें नहीं, सामना करें:- मुनिश्री ने जीवन के चार पक्षों—भागना, भोगना, जागना और त्यागना—की चर्चा करते हुए कहा कि कठिन परिस्थितियों से भागना आसान लगता है, लेकिन इससे समस्याएं खत्म नहीं होतीं। उन्होंने अपने ब्रह्मचर्य जीवन का एक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि खुरई प्रवास के दौरान एक बंदर उन्हें देखकर भभकने लगा। वे डरकर पीछे हटने लगे, तभी माली ने कहा—“त्यागी जी, भागिए मत।” मुनिश्री रुक गए तो बंदर भी वहां से भाग गया। उन्होंने कहा कि यह प्रसंग जीवन की बड़ी सीख देता है। जब परिस्थितियों का कोई ‘बंदर’ भभकी दे तो उससे भागना नहीं, बल्कि जागरूक होकर उसका सामना करना चाहिए। मुनिश्री ने कहा कि परिस्थितियों के सामने लाचार होकर उन्हें भोगते रहना भी उचित नहीं है।
परिस्थितियों को बदला जा सकता है तो उसके लिए प्रयास करना चाहिए और यदि तत्काल बदलाव संभव नहीं है तो उसके प्रति जागरूक होकर नुकसान को कम करने और समाधान की दिशा में प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा, “सुप्त आत्मा कर्म को भोगती है और जागृत आत्मा कर्म को काटती है।” जीवन में आने वाली परेशानियों के लिए केवल बाहरी लोगों या परिस्थितियों को दोषी नहीं ठहराना चाहिए। वे केवल निमित्त हैं, जबकि वास्तविक कारण हमारे अपने कर्म हैं। मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि विपरीत परिस्थितियों में घबराने या असहाय होने के बजाय आत्मबल और पुरुषार्थ के साथ उनका सामना करें। जीवन की सच्ची सफलता कठिनाइयों से भागने में नहीं, बल्कि जागरूक होकर उनका सामना करने में है। गुणायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज एवं मुनि श्री संधान सागर महाराज का संघ सहित गुणायतन में चातुर्मास चल रहा है। उनके सान्निध्य में प्रतिदिन अभिषेक-शांतिधारा, मंगल प्रवचन, स्वाध्याय और शंका समाधान के कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं।