साधु समाधि की रक्षा करना प्रत्येक श्रद्धालु का सर्वोच्च कर्तव्य : मुनि प्रमाण सागर महाराज।
SHIKHAR DARPANWednesday, August 26, 2026
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मधुबन,शिखर दर्पण संवाददाता।
राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि साधु-संतों की समाधि, साधना और शांति की रक्षा करना प्रत्येक श्रद्धालु का सर्वोच्च कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार संकट के समय मनुष्य अपनी मूल्यवान वस्तुओं की रक्षा करता है, उसी प्रकार जीवन में अपने आंतरिक गुणों और आध्यात्मिक मूल्यों की रक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए। मुनि श्री ने कहा कि साधु सामान्य व्यक्ति नहीं होते। वे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र रूपी रत्नत्रय की साधना करते हैं। अपने इस अमूल्य रत्नत्रय की रक्षा करना उनके जीवन की सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। ऐसे में श्रद्धालुओं का भी दायित्व है कि साधु-संतों के जीवन में उत्पन्न होने वाली किसी भी आपत्ति, असुविधा या असमाधि के कारण को दूर करने का प्रयास करें। उन्होंने स्पष्ट किया कि साधु समाधि भावना केवल संकट आने पर सहायता करने तक सीमित नहीं है। ऐसा वातावरण और व्यवस्था बनाना भी श्रद्धालुओं की जिम्मेदारी है, जिससे साधु-संतों की साधना, स्वाध्याय और आत्मचिंतन में कोई बाधा उत्पन्न न हो।
मुनि श्री ने साधु समाधि और गुरु सेवा के अंतर को समझाते हुए कहा कि गुरु सेवा गुणानुराग और सेवा भाव से की जाती है, जबकि साधु समाधि का संबंध साधु के जीवन में उत्पन्न होने वाली आपत्ति एवं असमाधि के कारणों के निवारण से है। उन्होंने कहा कि साधु-संतों के प्रति संवेदनशीलता और सजगता रखना धार्मिक संस्कारों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मुनि प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि साधु का अर्थ सहजता और समाधि का अर्थ शांति से भी जोड़ा जा सकता है। जहां सहजता होती है, वहां शांति और समाधि बनी रहती है, जबकि असहजता, तनाव और विक्षेप से असमाधि उत्पन्न होती है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे अपने जीवन में सहजता और शांति बढ़ाने का प्रयास करें तथा कम से कम यह संकल्प जरूर लें कि उनके किसी व्यवहार या असावधानी से किसी साधु-संत की साधना और समाधि में बाधा न पहुंचे। उन्होंने कहा कि साधु की समाधि की रक्षा केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि धर्म, संस्कार और आध्यात्मिक परंपरा की रक्षा का भी महत्वपूर्ण माध्यम है। मुनि श्री के प्रवचनों से श्रद्धालुओं को धर्म को केवल धार्मिक क्रियाओं तक सीमित न रखकर उसे व्यवहार और जीवनचर्या में उतारने की प्रेरणा मिल रही है।