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वीरशासन जयंती पर राष्ट्रसंत मुनि प्रमाण सागर महाराज का संदेश: "गुणायतन का लक्ष्य संस्कारित समाज का निर्माण"।

मधुबन,शिखर दर्पण संवाददाता।

वीरशासन जयंती के पावन अवसर पर न्यू गुणायतन परिसर में आयोजित विशाल धर्मसभा में गुणायतन प्रणेता राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि गुणायतन केवल मंदिर या निर्माण परियोजना नहीं, बल्कि समाज के गुणात्मक परिवर्तन का राष्ट्रीय अभियान है। इसका उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में संस्कार, संयम, सेवा और समर्पण जैसे मूल्यों की स्थापना करना है। उन्होंने कहा कि वीरशासन जयंती जैन परंपरा का अत्यंत गौरवशाली दिवस है। इसी दिन भगवान महावीर ने इंद्रभूति गौतम सहित प्रथम गणधरों को दीक्षा देकर चतुर्विध संघ और द्वादशांग श्रुत की स्थापना की थी। भगवान महावीर के शासन में रहने का वास्तविक अर्थ उनके अनुशासन, करुणा, वीतरागता और आदर्शों को अपने जीवन में अपनाना है। धर्मसभा को संबोधित करते हुए राष्ट्रसंत ने कहा कि केवल प्रवचन सुनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि श्रद्धा के साथ उसे जीवन में उतारना आवश्यक है। उन्होंने कहा, "गुरु को मानने और गुरु की मानने में बहुत अंतर है।" गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा वही है, जो व्यक्ति को उनके वचनों के अनुरूप जीवन जीने की प्रेरणा दे। उन्होंने आध्यात्मिक उन्नति के चार आधार—श्रद्धा, समर्पण, साधना और सिद्धि—का उल्लेख करते हुए कहा कि श्रद्धा आधार है, समर्पण बीज है, साधना उसका सिंचन और सिद्धि उसका परम फल है।

इंद्रभूति गौतम का उदाहरण देते हुए उन्होंने पूर्ण समर्पण को आध्यात्मिक उन्नति का सबसे बड़ा माध्यम बताया। आचार्य गुरुदेव विद्यासागर महाराज का स्मरण करते हुए मुनिश्री ने कहा कि उनके विचार आज भी समाज को आध्यात्मिकता, संस्कार और सेवा का मार्ग दिखा रहे हैं। उन्होंने बताया कि गुणायतन के भावनायोग, गुरुकुल, संस्कार शिविर और सेवा प्रकल्प समाज में नैतिक एवं आध्यात्मिक चेतना का प्रभावी माध्यम बन रहे हैं।राष्ट्रसंत ने कहा कि श्री सम्मेद शिखरजी साधना और आत्मशुद्धि का अद्वितीय सिद्धक्षेत्र है। उन्होंने स्पष्ट किया कि गुणायतन का वास्तविक कार्य निर्माण पूरा होने के बाद शुरू होगा। मंदिर और अनुभव केंद्र केवल साधन हैं, जबकि अंतिम लक्ष्य संस्कारित परिवार, चरित्रवान युवा और मूल्यनिष्ठ समाज का निर्माण है। चातुर्मास के लिए उन्होंने श्रद्धालुओं को संकल्प, संयम, सेवा और समर्पण के चार जीवन-सूत्र दिए और आह्वान किया कि प्रत्येक श्रद्धालु यह संकल्प ले—"गुरु का सपना ही मेरा सपना है, गुणायतन मेरा अपना है।" उन्होंने धर्मकार्य में विवेक अपनाने तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही दायित्व स्वीकार करने की सीख भी दी। राष्ट्रसंत ने बताया कि गुणायतन आज केवल श्री सम्मेद शिखरजी तक सीमित नहीं है, बल्कि गुरुकुल, ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण, जिनालय निर्माण, पर्यावरण संरक्षण एवं विभिन्न सेवा परियोजनाओं के माध्यम से राष्ट्र निर्माण का व्यापक कार्य कर रहा है।

उन्होंने सेवा एवं संस्कार अभियान को गति देने के लिए युवाओं की एक सशक्त राष्ट्रीय टीम गठित करने की भी घोषणा की। इस अवसर पर गुणायतन के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जी काला ने कहा कि संस्था का उद्देश्य केवल भव्य निर्माण नहीं, बल्कि संस्कारित समाज का निर्माण है। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से राष्ट्रसंत के संकल्पों को जन-जन तक पहुंचाने का आह्वान किया। कार्यक्रम में नौ दिवसीय उपवास पूर्ण करने वाले तपस्वियों का सम्मान किया गया। साथ ही चातुर्मास स्थापना में मुख्य कलश, चातुर्मास चक्रवर्ती एवं नवरत्न परिवारों का अभिनंदन भी किया गया। गुणायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन 'विद्यावाणी' ने बताया कि चातुर्मास स्थापना समारोह में देश-विदेश से हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। गुजरात के अतुल-शीतल लादाणी (बकसरा) परिवार ने मुख्य कलश की स्थापना की, जिन्हें "चातुर्मास चक्रवर्ती" की उपाधि से सम्मानित किया गया। उन्होंने बताया कि पूरे चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन धर्मसभा, स्वाध्याय, शंका समाधान, सामायिक, साधना, संस्कार शिविर, युवा एवं महिला कार्यक्रम तथा सेवा गतिविधियां नियमित रूप से आयोजित होंगी। समारोह में बैंकॉक, सिंगापुर, सिडनी और ह्यूस्टन सहित विभिन्न देशों से पहुंचे श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने गुणायतन के प्रति वैश्विक आस्था का परिचय दिया।

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