आत्मा में कर्मबन्ध की प्रक्रिया मन, वचन और काय की प्रत्येक प्रवृत्ति से प्रारंभ होती है, इसलिए "पाप करने से डरो":- मुनि प्रमाणसागर महाराज।
SHIKHAR DARPANSaturday, July 25, 2026
0
पीरटांड,शिखर दर्पण संवाददाता।
सिद्धचक्र महामंडल विधान के पाँचवें दिवस राष्ट्रसंत मुनि श्री 108 प्रमाणसागर महाराज ने कर्मबन्ध के सूक्ष्म विज्ञान का सरल, वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विवेचन करते हुए कहा कि आत्मा में कर्मबन्ध की प्रक्रिया मन, वचन और काय की प्रत्येक प्रवृत्ति से प्रारंभ होती है। इसलिए मनुष्य को प्रत्येक क्षण सजग और सावधान रहना चाहिए तथा "पाप करने से डरो, पाप करके मत डरो" के सिद्धांत को जीवन में अपनाना चाहिए। गुणायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन 'विद्यावाणी' ने बताया कि मुनि ने कहा— प्रत्येक महान कार्य सुविचारित योजना और क्रमबद्ध प्रक्रिया से ही पूर्णता को प्राप्त होता है। इसी प्रकार श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान और आत्मशुद्धि का महान साधना-पर्व है। मुनि ने कहा कि हमारे प्रत्येक भाव, विचार और कर्म से आत्मा में स्पंदन उत्पन्न होता है, जिससे कर्म-पुद्गल आकर्षित होकर आत्मा से बंध जाते हैं। यही कर्म आगे चलकर शुभ अथवा अशुभ फल प्रदान करते हैं। उन्होंने इसे "आंतरिक कैमरे" की उपमा देते हुए कहा कि हमारी चेतना प्रत्येक भाव और कर्म का सूक्ष्म लेखा-जोखा निरंतर संचित करती रहती है।उन्होंने कर्मबन्ध के तीन चरणों— समरम्भ, समारम्भ और आरम्भ —का विस्तृत विवेचन करते हुए बताया कि किसी कार्य का प्रारंभिक संकल्प समरम्भ, उसकी तैयारी समारम्भ तथा वास्तविक क्रियान्वयन आरम्भ कहलाता है।
यह प्रक्रिया मन, वचन और काय—तीनों स्तरों पर घटित होती है। इसलिए यदि कोई अशुभ प्रवृत्ति उत्पन्न हो तो उसे समरम्भ अथवा समारम्भ की अवस्था में ही रोक देना चाहिए, जबकि धर्म और पुण्य के कार्य पूरे उत्साह, श्रद्धा और समर्पण के साथ करने चाहिए। मुनि ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि विधान के प्रत्येक चरण में भगवान की दिव्य उपस्थिति का अनुभव करें तथा प्रत्येक अर्घ्य समर्पण के समय निर्मल भाव से प्रार्थना करें— "हे प्रभु! मेरे पापों का क्षय हो, मेरा आत्मकल्याण हो।" ऐसे निष्कपट भावों से की गई आराधना ही वास्तविक आध्यात्मिक फल प्रदान करती है।राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन 'विद्यावाणी' ने बताया कि शनिवार को सम्पन्न विधान में मुनिश्री ने चार कषाय— क्रोध, मान, माया और लोभ —को समरम्भ, समारम्भ और आरम्भ की अवस्थाओं में मन, वचन और काय से त्यागने का संदेश दिया। इसी भावना के साथ उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं तथा देश-विदेश में ऑनलाइन विधान कर रहे साधकों ने प्रभु चरणों में 108 अर्घ्य समर्पित कर कुल 128 अर्घ पूर्ण किए। उन्होंने बताया कि साधुओं के नाम के आगे 108 लिखे जाने का आध्यात्मिक महत्व भी इसी संदर्भ से जुड़ा हुआ है।उन्होंने बताया कि विधान के छठे दिवस, रविवार को "कर्म-दहन" की भावना के साथ 256 अर्घ्य प्रभु चरणों में समर्पित किए जाएंगे।
अपने प्रवचन में मुनि ने कहा कि मनुष्य के प्रत्येक कर्म का फल निश्चित है। सामान्यतः मनुष्य पाप करते समय असावधान रहता है, किंतु जब उसी पाप का परिणाम सामने आता है तो वह भगवान से प्रश्न करता है कि उसे यह दुःख क्यों मिला। ज्ञानी व्यक्ति पाप करने के बाद नहीं, बल्कि पाप करने से पहले ही सावधान हो जाता है। इसलिए संतों का संदेश है— "पाप करने से डरो, पाप करके मत डरो।"उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि यदि इस विधान से केवल एक प्रार्थना करनी हो तो यही करें— "हे प्रभु! मेरे हृदय में पाप के प्रति भय उत्पन्न कर दीजिए।" क्योंकि "पाप से भीति, प्रभु से प्रीति का मार्ग प्रशस्त करती है और प्रभु से प्रीति, संयम की प्रतीति का आधार बनती है।" अंत में मुनि ने सभी श्रद्धालुओं से समय का सदुपयोग, अनुशासन एवं एकाग्रता बनाए रखते हुए विधान में सहभागी बनने का आह्वान किया, ताकि यह महान साधना निर्धारित समय पर पूर्ण होकर सभी के जीवन में आत्मशुद्धि, सद्भाव और आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम बने।संपूर्ण विधान राष्ट्रसंत मुनि 108 प्रमाणसागर महाराज एवं मुनि 108 संधानसागर महाराज के मुखारविन्द से संस्कृत भाषा में ऋद्धि-सिद्धि मंत्रों के साथ सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर संघस्थ मुनि संघ मंचासीन रहा। प्रतिष्ठाचार्य ब्रह्मचारी अशोक भैया, ब्रह्मचारी अभय भैया, सहायक अमित बास्तु, पंडित सुदर्शन जी, राहुल जैन सहित संगीतकारों की मधुर स्वर-लहरियों के बीच जब मुनिश्री के मुखारविन्द से मंत्रोच्चार हुआ तो संपूर्ण पांडाल आध्यात्मिक ऊर्जा और जयघोष से गूंज उठा।