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"साधना के बिना सिद्धि नहीं, आराधना से मिलती है साधना की प्रेरणा" :- मुनि प्रमाण सागर महाराज।

गिरीडीह,शिखर दर्पण संवाददाता। 

गुणायतन सम्मेद शिखर तीर्थराज में आयोजित पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव के पाँचवें दिवस पूर्णिमा के अवसर पर भगवान ऋषभदेव के केवलज्ञान कल्याणक, समवसरण एवं प्रथम आहारदान के प्रसंग श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न हुए। भगवान के समवसरण में पूज्य मुनि प्रमाण सागर महाराज, मुनि संधान सागर महाराज, मुनि सार सागर महाराज, मुनि समादर सागर महाराज एवं मुनि रूप सागर महाराज विराजमान रहे।गणधर पीठ से मुनि प्रमाण सागर महाराज ने ओंकार ध्वनि के साथधर्मसभा का शुभारंभ किया तथा मुनिराजों,प्रतिष्ठाचार्य अशोक भैया,अभय भैया एवं श्रद्धालुओं द्वारा पूछे गए आध्यात्मिक प्रश्नों का समाधान किया। प्रवक्ता अविनाश जैन 'विद्यावाणी' ने बताया कि मंगलवार को प्रातःकालीन बेला में कैलाश पर्वत से भगवान के निर्वाण के धार्मिक मंचन, मोक्ष कल्याणक पूजा एवं हवन के साथ पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव का समापन होगा। सोमवार को पूर्णिमा के अवसर पर मुनि श्री के मुखारविंद से 55 मिनट की वृहद शांतिधारा संपन्न हुई। तथा भगवान ऋषभदेव को प्रथम "आहारदान" शुद्धी के साथ दिया गया प्रसंग में बताया गया कि पूर्वभव के कर्मयोग से बैल के मुख पर मुसिका बाँधने के कारण भगवान को लगभग एक वर्ष एक माह तेरह दिन तक आहार की विधि नहीं मिली अंततः हस्तिनापुर में राजा श्रेयाँस एवं राजा सोम को अवधिज्ञान से आहारदान विधि का ज्ञान हुआ।उन्होंने भगवान का विधिपूर्वक पड़गाहन कर इक्षुरस से आहारदान दिया और दान तीर्थ का प्रवर्तन किया।

अपने मंगल प्रवचन में मुनि प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि "कर्म किसी को भी नहीं छोड़ते और साधना के बिना सिद्धि संभव नहीं।" भगवान ऋषभदेव ने सर्वस्व का त्याग इसलिए किया क्योंकि उनका लक्ष्य सिद्धि था और सिद्धि केवल कठोर साधना से ही प्राप्त होती है। उन्होंने साधना, आराधना, सिद्धि और शुद्धि की चर्चा करते हुए कहा कि "यदि लक्ष्य सिद्धि का है तो साधना अनिवार्य है।" भगवान ने राजमहल का त्याग कर तप, ध्यान और आत्मसाधना का मार्ग अपनाया तथा बाहरी और भीतरी परिस्थितियों में सामंजस्य स्थापित कर आत्मस्वरूप में स्थित हुए।मुनि श्री ने कहा कि जब तक मनुष्य बाहरी आलंबनों पर निर्भर रहता है, तब तक उसका मन भटकता रहता है। आत्मा का आलंबन ही वास्तविक स्थिरता प्रदान करता है। "भटकाव संसार है और ठहराव ही मुक्ति का मार्ग है।"आचार्य समंतभद्र की स्तुतियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जिसे आत्मवैभव का अनुभव हो जाता है, उसके लिए सांसारिक वैभव का कोई मूल्य नहीं रह जाता। भगवान के लिए चक्रवर्ती का विशाल साम्राज्य भी सड़े हुए तिनके के समान तुच्छ हो गया था।उन्होंने कहा कि यदि कोई स्थायी रूप से दुःखों से मुक्त होना चाहता है तो उसे साधना के मार्ग पर आगे बढ़ना होगा। यदि अभी साधना का सामर्थ्य नहीं है तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे लोगों के लिए आराधना का मार्ग खुला है। साधकों और सिद्ध पुरुषों को आदर्श मानकर उनकी सेवा, भक्ति, पूजा और शरण ग्रहण करना ही आराधना है। यही आराधना आगे चलकर साधना की प्रेरणा बनती है। मुनि श्री ने कहा कि साधना में सबसे बड़ी बाधा मोह और राग हैं। मनुष्य स्वयं को परिवार का कर्ता और रक्षक मानकर आत्मकल्याण को भूल जाता है।

जब तक राग और मोह का त्याग नहीं होगा, तब तक आत्मा की ओर यात्रा प्रारंभ नहीं हो सकती।उन्होंने कहा कि आत्मा में जितने कर्म शांत होंगे, उतनी ही शुद्धि बढ़ेगी। शुद्धि से पात्रता विकसित होती है और यही पात्रता साधक को सिद्धि के मार्ग तक पहुँचाती है। भगवान भी एक ही जन्म में इस परम अवस्था तक नहीं पहुँचे, बल्कि अनेक भवों तक आराधना के माध्यम से पात्रता अर्जित कर साधना द्वारा सिद्धि प्राप्त की।मुनि श्री ने कहा कि साधना का स्वरूप ज्ञान और ध्यान है, जबकि आराधना का स्वरूप दान, पूजा, भक्ति और सेवा है। जो व्यक्ति निरंतर ध्यान और ज्ञान में लीन नहीं हो सकता, वह संतों की सेवा, भक्ति और पूजा के माध्यम से भी अपने जीवन को साधना के योग्य बना सकता है। उन्होंने कहा, "जैसे खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है, वैसे ही श्रेष्ठ साधकों का सान्निध्य मनुष्य के अंतरंग को बदल देता है।"उन्होंने कहा कि आचार, विचार, आहार और व्यवहार की शुद्धि ही सिद्धि का वास्तविक आधार है। तीर्थंकरों के पूर्वभवों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य भव में उन्होंने दान, पूजा और धर्म की आराधना की तथा मुनि बनने पर तप, ध्यान और साधना में लीन रहे। देवगति में दान देने का अधिकार नहीं होता, वहाँ सेवा, भक्ति और धर्म के प्रति समर्पण ही आराधना का स्वरूप है। सम्यग्दृष्टि देव अपने स्वर्गीय वैभव का मोह छोड़कर भगवान के कल्याणकों, जिनालयों और संतों की सेवा में उपस्थित होते हैं।अंत में मुनि श्री ने कहा, "आराधना फूल है और साधना उसका फल।" जिस प्रकार फूल के बिना फल की प्राप्ति संभव नहीं, उसी प्रकार आराधना के बिना साधना की वास्तविक पात्रता विकसित नहीं होती। उन्होंने श्रद्धालुओं का आह्वान किया कि वे दान, पूजा, भक्ति और सेवा के माध्यम से अपनी आत्मा को शुद्ध बनाएं। यही आराधना आगे चलकर साधना का आधार बनेगी और अंततः सिद्धि का मार्ग प्रशस्त करेगी।

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