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मुनि प्रमाण सागर ने गुणायतन का निर्माण कर जैन संस्कृति को सुरक्षित रखने की दिशा में ऐतिहासिक कार्य किया है"- आचार्य बसुनंदी।

पीरटांड,शिखर दर्पण संवाददाता।

गुणायतन में चल रहे पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के चतुर्थ दिवस "तप कल्याणक" के अवसर पर प्रातः 5:45 बजे मंगलाष्टक के साथ अभिषेक, शांतिधारा एवं नित्य पूजन सम्पन्न हुआ। दोपहर  में महाराजा नाभिराय का दरबार सजाया गया, जिसमें युवराज आदिकुमार के विवाह, राज्याभिषेक एवं राज संचालन के प्रसंगों का मंचन किया गया। नीलांजना अप्सरा की असामयिक मृत्यु को देखकर आदिकुमार में वैराग्य उत्पन्न होता है और वे राज्य त्याग कर वन की ओर प्रस्थान करते हैं,उपरोक्त जानकारी गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ने देते हुये बताया प्रमाण सागर महाराज द्वारा दीक्षा संस्कार विधी पूर्वक सम्पन्न कराया गया। प्रतिष्ठाचार्य ब्र. अशोक भैया,ब्र अभय भैया,द्वारा  प्रमुख पात्रों के माध्यम से राज्याभिषेक विधी,  एवं भरत-बाहुबली प्रसंग एवं ब्राह्मी और सुंदरी के माध्यम से अंक विद्या को सिखाया एवं बाल ब्र.रहकर अपने पिता का सिर झुकने से बचाया तथा राज्य संचालन एवं षठ कर्म का उपदेश देते हुये असी, मसी,  कृषी, विद्या, वाणिज्य, और शिल्प कार्य का उपदेश दिया राज्य दरबार लगा हुआ था ,स्वर्ग कीअप्सरा नीलांजना का नृत्य एवं उसकी असमय मृत्यु को देखकर आदि कुमार को बैराग्य हो जाता है और वह वन गमन कर जाते है, जिसमें सत्ता के लिए भरत एवं बाहुबली दोनों भाइयों के युद्ध एवं बाहुबली के वैराग्य को दर्शाया गया।

आगामी कार्यक्रम के अंतर्गत एक मई को पंचकल्याणक के पांचवें दिवस प्रातः आहार चर्या सम्पन्न होगी तथा मध्यान्ह में समवसरण में भगवान को केवलज्ञान की प्राप्ति का आयोजन होगा, जहाँ से मुनि श्री की देशना होगी। इसके पश्चात 2 मई को मोक्ष कल्याणक मनाया जाएगा, जिसमें भगवान के मोक्ष गमन एवं अंतिम संस्कार की विधियां संपन्न होंगी।इस अवसर पर मुनि ने धर्मसभा को सम्वोधित करते हुये कहा कि हमें उत्तम परिवार, श्रेष्ठ संस्कार, सुसंस्कृत बुद्धि एवं स्वस्थ शरीर प्राप्त हुआ है, जो अपने-आप में दुर्लभ है। यदि इनमें से कोई एक भी कमी होती, तो जीवन की दिशा बदल सकती थी। अतः यह समझना आवश्यक है कि मनुष्य जन्म “गोल्डन चांस” से भी बढ़कर अवसर है।उन्होंने कहा कि जीवन का उद्देश्य मोक्ष है और दीक्षा उसका मार्ग है।

हालांकि तत्काल दीक्षा लेने के बजाय पहले अपने जीवन को समझना और आंतरिक तैयारी करना आवश्यक है। वास्तविक “मरण” शरीर का त्याग नहीं, बल्कि राग-द्वेष, क्रोध और अहंकार का परित्याग कर आत्मा की शुद्धि करना है। गृहस्थ जीवन के संदर्भ में मुनि श्री ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना चाहिए तथा प्रतिदिन स्वाध्याय, ध्यान एवं णमोकार मंत्र का अभ्यास करना चाहिए। व्यवहार में अहिंसा, सत्य एवं संयम को अपनाते हुए धीरे-धीरे वैराग्य की भावना विकसित करनी चाहिए।उन्होंने बताया कि दीक्षा कोई प्रारंभ नहीं, बल्कि साधना का परिणाम है। बिना तैयारी के भावुकता में लिया गया निर्णय स्थायी नहीं होता, जबकि क्रमिक साधना व्यक्ति को स्थिर और सच्चे मार्ग पर अग्रसर करती है, इस अवसर पर मुनि संधान सागर महाराज मुनि सार सागर,मुनि समादर सागर, मुनि रुप सागर महाराज सहित संघ उपस्थित थे।

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