सम्मेदशिखर में मुनि प्रमाणसागर महाराज का प्रवचन: साधना और आराधना के समन्वय से ही आगे बढ़ता है धर्म मार्ग।
SHIKHAR DARPANMonday, April 20, 2026
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गिरिडीह,शिखर दर्पण संवददाता।
तीर्थराज श्री सम्मेदशिखर स्थित “गुणायतन” में आयोजित प्रवचन सभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि धर्म की सशक्त परंपरा साधु की साधना और श्रावक की आराधना के समन्वय से ही आगे बढ़ती है। उन्होंने कहा कि साधु अपनी तपस्या, संयम और आत्मशुद्धि से धर्म का आदर्श प्रस्तुत करता है, वहीं श्रावक श्रद्धा, सेवा, दान और सहयोग के माध्यम से उस आदर्श को समाज में स्थापित करता है। जब दोनों प्रवाह साथ चलते हैं, तभी धर्म का मार्ग सुदृढ़ और स्थायी बनता है। गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि मुनि श्री ने अपने प्रवचन में स्पष्ट किया कि केवल साधु की साधना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि साधना प्रेरणा देती है, जबकि उसे समाज में प्रसारित करने का कार्य श्रावक करता है। इसी प्रकार केवल आराधना भी अधूरी है यदि उसके पीछे साधना का आदर्श न हो। इसलिए धर्म की प्रगति के लिए दोनों का संतुलन आवश्यक है। मुनि श्री ने कहा कि धर्म बाहरी आडंबर का विषय नहीं, बल्कि आंतरिक आत्मशुद्धि की प्रक्रिया है। जीवन में विचारों की पवित्रता, सावधानी और लक्ष्य की स्पष्टता जरूरी है।
जब व्यक्ति धर्ममार्ग पर चलने का संकल्प लेता है, तभी उसका जीवन सार्थक बनता है। उन्होंने “दान तीज” के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दान का अर्थ केवल धन देना नहीं, बल्कि लोभ का त्याग करना है। दान से त्याग, समर्पण और करुणा की भावना विकसित होती है, जिससे मन की शुद्धि होती है। उन्होंने दान के विभिन्न रूपों—आहार दान, पूजा दान, ज्ञान दान और अभय दान—का उल्लेख करते हुए कहा कि ये सभी व्यक्ति को पुण्य और पवित्रता से जोड़ते हैं। मुनि श्री ने सूत्र रूप में कहा कि “दान से मन की शुद्धि होती है और साधना से मोक्षमार्ग सुरक्षित होता है।” अंत में उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से दान, सेवा और साधना को जीवन में अपनाने का आह्वान किया। इस अवसर पर संघस्थ मुनि श्री संघान सागर महाराज, मुनि श्री सार सागर महाराज, मुनि श्री समादर सागर महाराज, मुनि श्री रूप सागर महाराज सहित आर्यिकाश्री एवं त्यागी वृत्ति उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन ब्र. अशोक भैया एवं ब्र. अभय भैया ने किया।