ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा जिसे देव स्नान पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है, आज ही के दिन भगवान श्रीजगन्नाथ अपने गर्भगृह से स्नान करने के लिए बाहर आते हैं। कल से १५ दिन तक ठाकुर जी के दर्शन बंद रहेंगे एवं रथयात्रा के दिन श्री जगन्नाथ जी सभी को दर्शन देने फिर से श्रीमंदिर के बाहर पधारेंगे।
भाव यह है कि ज्वर आने पर ठाकुर जी के दर्शन कल से अब 15 दिन नही हो पाएंगे क्यों कि भक्तों के लाडले जगन्नाथ जी कल अपनी मौसी के यहाँ चले जाएंगे। इनकी नित्य सेवा इनको लाड से श्रृंगार करना......भोग राग सेवा सब होगी तो नित्य की भांति ही ....पर पट के भीतर ही भीतर । श्री जगन्नाथ जी अधिक स्नान के कारण हुए ज़्वर आने से भक्तों को दर्शन नहीं देंगे। रथयात्रा के दिन फिर से ठाकुर अपने विरही भक्तों को दर्शन देने पधारेगें।
भगवान श्रीकृष्ण जब द्वारिका में थे तो अक्सर ब्रजवासियों को याद करते थे। ये बात उनकी रानियों ने जान ली थी। उनको बहुत इच्छा थी यह जानने की कि भगवान ब्रजवासियों को क्यों इतना याद करते हैं, क्या रानियों की सेवा में किसी प्रकार की कमी है?
एक दिन सभी ने मिल कर रोहिणी मैया को घेर लिया व कहा कि हमें ब्रज और ब्रज लीलाओं के बारे में सुनाइये। माता ने कहा कि कृष्ण ने मना किया है। रानियों ने कहा कि अभी तो वे यहाँ नहीं हैं, फिर भी द्वार पर सुभद्रा जी को बिठा देती हैं, अगर वे आते दिखेंगे तो वे हमें इशारे से बता देगीं और हम सब कुछ और विषय पर बातें करने लग जायेंगीं ।
बहुत अनुनय-विनय करने पर माता रोहिणी मान गईं।
कक्ष के द्वार पर सुभद्रा जी को बिठा दिया और सब अन्दर रोहिणी माता से ब्रज-लीलायें सुनने लगीं। सुभद्रा जी भी कान लगा कर सुनने लगीं, और लीला सुनने में ही मस्त हो गईं।उनको पता ही नहीं चला कि कब भगवान श्रीकृष्ण और दाऊ बलराम उनके दोनों ओर आकर बैठ गये हैं और वे भी लीला-श्रवण का रसास्वादन कर रहे हैं।
भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी जब श्रीकृष्ण-प्रेम में मग्न, श्रीकृष्ण लीलाओं का रसास्वादन करते थे तो आपने कई बार प्रेम के अष्ट-सात्विक विकार प्रकट करने की लीला भी की, यह बताने के लिये कि कृष्ण-प्रेम की ऊंचाई पर ऐसे विकार भी शरीर में आ सकते हैं। जैसे बाहें शरीर के भीतर चली जाती हैं, आंखें फैल जाती हैं, आंखों में आँसुओं की धारायें बहती हैं, सारा शरीर पुलकायमान हो जाता है इत्यादि।
ऐसी ही लीला भगवान श्रीकृष्ण, श्रीबलराम व श्रीसुभद्रा जी ने भी की। आपके दिव्य शरीर में लीलाओं के श्रवण से अद्भुत विकार आने लगे। आपकी आँखें फैल गयीं, बाहें / चरण अन्दर चले गये इत्यादि।
भगवान की इच्छा से श्री नारद जी उस समय द्वारिका के इस महल के आगे से निकले। उन्होंने भगवान का ऐसा दिव्य रूप देखा।कुछ आगे जाकर सोचा कि यह मैंने क्या देखा। अद्भुत दृश्य !! फिर वापिस आये।
उधर रोहिणी माता को पता चल गया कि कोई बाहर है । उन्होंने लीला सुनाना बन्द कर दिया। भगवान वापिस अपने रूप में आ गये। नारद जी ने प्रणाम करके भगवान श्री कृष्ण से कहा- हे प्रभु ! मेरी इच्छा है कि मैंने आज जो रूप देखा है, वह रूप आपके भक्त जनों को पृथ्वी लोक पर चिरकाल तक देखने को मिले। आप इस रूप में पृथ्वी पर वास करें।
श्री कृष्ण नारद जी की बात से प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि ऐसा ही होगा।
भगवान श्रीकृष्ण, श्रीबलराम, श्रीसुभद्रा जी का वही भावमय रूप ही श्रीजगन्नाथ पुरी धाम में श्रीजगन्नाथ, श्रीबलदेव व श्री सुभद्रा जी के रूप में प्रकट है।
पुरी धाम में श्रीजगन्नाथ भगवान स्वयं पुरुषोत्तम हैं। आपने दारु-ब्रह्म रूप से नीलाचल जगन्नाथपुरी धाम में कृपा-पूर्वक आविर्भूत होकर जगत-वासियों पर कृपा की।
स्नान यात्रा अर्थात आज ही के दिन भगवान श्रीजगन्नाथ जी का प्राकट्य हुआ था। अर्थात् भगवान जगन्नाथ जी स्नान यात्रा के दिन ही इस धरातल पर प्रकट हुए थे।

