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धन को साधन बनाएं, स्वामित्व का भाव नहीं : मुनि प्रमाण सागर/संतान को संपत्ति नहीं, स्वतंत्र व्यक्तित्व समझें।

मधुबन,शिखर दर्पण संवाददाता।

गुणायतन परिसर में चल रहे दस दिवसीय श्रावक संस्कार शिविर के नौवें दिन राष्ट्रसंत मुनि प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि धन और संपत्ति जीवन के साधन हैं, इन्हें अपना स्वामित्व और अहंकार का आधार नहीं बनाना चाहिए। उत्तम आकिंचन्य धर्म का अर्थ धन छोड़ना नहीं, बल्कि धन के प्रति आसक्ति और “मेरा” के भाव को छोड़ना है।उन्होंने कहा कि मनुष्य दिनभर मेरा घर, मेरा परिवार, मेरा धन और मेरे बच्चों के भाव में जीता है। यही स्वामित्वबोध कई पारिवारिक विवादों की जड़ बन जाता है। वस्तुएं हमारे पास रहती हैं, लेकिन उनके स्वामी समय के साथ बदलते रहते हैं। इसलिए धन का उपयोग सेवा और सदुपयोग के लिए होना चाहिए।

मुनि श्री ने कहा कि संबंधों में प्रेम रखें, मोह और अधिकार का भाव नहीं। माता-पिता संतान का पालन-पोषण और संस्कार करें, लेकिन बच्चों को अपनी संपत्ति न समझें। उन्हें अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार जीवन चुनने की स्वतंत्रता भी दें। उन्होंने कहा कि उत्तम आकिंचन्य बाहरी गरीबी नहीं, बल्कि भीतर की निर्लिप्तता है। वस्तुओं का उपयोग करें, संबंधों में प्रेम रखें और धन का सदुपयोग करें, लेकिन किसी भी चीज को स्थायी मिल्कियत न मानें। “मेरा” का भाव जितना कम होगा, जीवन उतना ही सहज और आनंदमय बनेगा। गुणायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि दशलक्षण महापर्व के तहत आयोजित शिविर में श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन, संयम, त्याग और अपेक्षा-मुक्त संबंधों की प्रेरणा दी जा रही है। अनंत चतुर्दशी पर मुनि संधान सागर महाराज का अवतरण दिवस भी मनाया जाएगा।

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