क्रोध पर विजय का एक ही मार्ग है—सजगता, साधना और निरंतर अभ्यास" — राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज।
SHIKHAR DARPANSunday, August 02, 2026
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गिरीडीह,शिखर दर्पण संवाददाता।
गुणायतन प्रणेता राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बाहर नहीं, बल्कि उसके भीतर बैठी भावनात्मक दुर्बलताएँ हैं।इनमें क्रोध सबसे अधिक विनाशकारी है, क्योंकि यह व्यक्ति की शांति, विवेक, संबंध और व्यक्तित्व—सब कुछ नष्ट कर देता है। यदि जीवन को सुखी, संतुलित और सार्थक बनाना है तो क्रोध पर विजय प्राप्त करना ही सच्ची साधना है। उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति क्रोध को अपनी भाषा बना लेता है,तब वह बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया देने लगता है।यही कारण है किअधिकांश लोगों को यह भी पता नहीं चलता कि उन्हें कब और कैसे क्रोध आ गया। इसलिए परिवर्तन का पहला चरण है—अपने दोष को स्वीकार करना। मुनि श्री ने कहा"गुस्सा आना और गुस्सा करना दोनों अलग अलग बातें हैं।" सोच-समझकर किया गया क्रोध नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन जो क्रोध अवचेतन संस्कार बन चुका हो, वह अनायास प्रकट होता है। इसलिए सबसे पहले यह स्वीकार करना आवश्यक है कि "मुझे क्रोध आता है।"
मुनिश्री ने क्रोध से मुक्ति का अत्यंत व्यावहारिक उपाय बताते हुए कहा कि प्रतिदिन रात्रि में सोने से पहले पूरे दिन का आत्मनिरीक्षण करें।विचार करें कि दिनभर में किससे कठोर वचन बोले, किसका मन दुखाया, किस पर क्रोध किया या किसके प्रति अनुचित व्यवहार किया।फिर मन ही मन उन सभी से क्षमा याचना करें और स्वयं से संकल्प लें कि भविष्य में ऐसी परिस्थिति आने पर अधिक सजग रहेंगे। यह अभ्यास धीरे-धीरे मन में जागरूकता उत्पन्न करता है,और अगली बार क्रोध आने से पहले ही भीतर से चेतावनी मिलने लगती है।उन्होंने कहा कि जैसे ही यह अनुभव हो कि क्रोध आने वाला है,उसी क्षण स्वयं को रोक लें। स्मरण करें कि क्रोध केवल सामने वाले को नहीं, सबसे पहले स्वयं को जलाता है और यह मानसिक शांति को नष्ट करता है,परिवार और समाज में संबंधों को बिगाड़ता है तथा जीवन की सुख-शांति छीन लेता है। ऐसे समय नौ बार णमोकार मंत्र का जाप करें और मन में दृढ़ निश्चय करें कि किसी भी परिस्थिति में संयम नहीं छोड़ना है। राष्ट्रसंत ने कहा कि क्रोध पर नियंत्रण का तीसरा उपाय सकारात्मक भावना का निरंतर अभ्यास है। दिनभर बार-बार अपने मन से कहें—"मुझे शांत रहना है, मुझे संयम रखना है।" यह केवल शब्द नहीं, बल्कि आत्मसंस्कार का माध्यम है।
जैसे उफनते दूध में पानी की कुछ बूंदें डालते ही उसका उबाल शांत हो जाता है,वैसे ही बार-बार दोहराई गई यहभावना मन के उफान को शांत कर देती है। धीरे-धीरे यह संस्कार अवचेतन मन में बैठ जाता है और क्रोध का अवसर आने पर भीतर से स्वतः प्रेरणा मिलती है—"मुझे शांत रहना है।" मुनि श्री ने कहा कि केवल प्रवचन सुन लेने से जीवन नहीं बदलता। परिवर्तन तब आता है जब सुनी हुई बातों को व्यवहार में उतारा जाए। जिस प्रकार डॉक्टर की पर्ची लेकर घूमने से रोग समाप्त नहीं होता, बल्कि दवा नियमित लेने से स्वास्थ्य प्राप्त होता है, उसी प्रकार धर्म का वास्तविक लाभ भी तभी मिलता है जब उसके उपदेशों का नियमित अभ्यास किया जाए। प्रवचन सुनना पहला कदम है, लेकिन उस पर अमल करना ही वास्तविक साधना है।मुनिश्री ने निरंतर अभ्यास की महत्ता स्पष्ट करते हुए एक प्रेरक उदाहरण सुनाया। उन्होंने बताया कि एक गरीब व्यक्ति को एक सेठ ने जंगल में पेड़ काटने का काम दिया। पहले दिन उसने तेज धार वाली कुल्हाड़ी से कम समय में कई पेड़ काट दिए, लेकिन धीरे-धीरे कुल्हाड़ी की धार कुंद होती गई और उसकी मेहनत बढ़ती गई, जबकि परिणाम घटता गया। तब सेठ ने उसे समझाया कि केवल परिश्रम पर्याप्त नहीं, समय-समय पर कुल्हाड़ी की धार तेज करना भी आवश्यक है। जैसे धार के बिना कुल्हाड़ी प्रभावी नहीं रहती, वैसे ही साधना के बिना मनुष्य का जीवन भी अपनी शक्ति खो देता है।उन्होंने कहा कि जीवन की धार बनाए रखने का नाम ही साधना है। बाहरी परिश्रम से अधिक आवश्यक है कि व्यक्ति अपने भीतर की चेतना, विवेक और संयम को निरंतर पैना बनाए रखे। यही साधना व्यक्ति के जीवन में तप, आत्मबल और परिवर्तन का आधार बनती है।
राष्ट्रसंत ने उपस्थित श्रद्धालुओं का आह्वान करते हुए कहा कि इस चातुर्मास में प्रत्येक व्यक्ति एक संकल्प अवश्य ले कि उसे अपनी किसी एक कमजोरी पर विजय प्राप्त करनी है। विशेष रूप से क्रोध को साधने का लक्ष्य बनाएं और प्रतिदिन यह भावना दोहराएँ—"मुझे शांत रहना है, मुझे संयम रखना है।" यदि एक सप्ताह भी इस अभ्यास को पूरी निष्ठा से किया जाए तो उसके सकारात्मक परिणाम स्वयं अनुभव होने लगेंगे।उन्होंने विधान में सहभागी श्रद्धालुओं से कहा कि लोग विश्व शांति की कामना से विधान करने आते हैं, लेकिन छोटी-छोटी बातों पर स्वयं अशांत हो जाते हैं। इसलिए केवल विधान करना पर्याप्त नहीं, बल्कि विधान के भाव में डूबना आवश्यक है। उत्साह, श्रद्धा और आत्मसंयम के साथ जब व्यक्ति विधान में सहभागी बनता है, तभी उसका जीवन वास्तव में धन्य बनता है। अपने उद्बोधन का समापन करते हुए मुनिश्री ने कहा कि साधना किसी विशेष आयु, समय या परिस्थिति की मोहताज नहीं है। जिस दिन मनुष्य अपनी कमजोरी को पहचानकर उसे दूर करने का प्रयास प्रारंभ कर देता है,उसी दिन से उसके जीवन में वास्तविक प्रभात हो जाता है। यदि बीमारी सभी में है तो उपचार भी सभी को करना होगा।इसलिए "जब जागो, तभी सवेरा" की भावना के साथ आत्मसंयम, आत्मनिरीक्षण और निरंतर साधना को जीवन का अंग बनाकर ही जीवन को संस्कारित, शांत और सफल बनाया जा सकता है। मुनिश्री के इन प्रेरक उद्बोधनों ने उपस्थित श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन, भावनात्मक परिष्कार और संयमपूर्ण जीवन का संकल्प लेने के लिए प्रेरित किया। इस अवसर पर खुरई से श्री अशोक सिंघईश्रीमंत परिवार खुरई से श्रीसिद्ध चक्र महामंडल विधान के लिये लगभग 250 श्रद्धालुओं के साथ पधारे एवं विधान के शुभारंभ केपूर्व बाल ब्रह्मचारी अशोक भैया जी के निर्देशन में प्रारंभ किया ।