व्यवहार शुद्धि का मूल आधार है विनम्रता, केवल चरण स्पर्श नहीं — राष्ट्रसंत मुनि प्रमाण सागर।
SHIKHAR DARPANFriday, August 07, 2026
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गिरीडीह,शिखर दर्पण संवाददाता।
राष्ट्रसंत मुनि प्रमाण सागर महाराज ने प्रातःकालीन धर्मसभा में व्यवहार शुद्धि पर आधारित प्रेरक प्रवचन देते हुए कहा कि मनुष्य का जीवन भाव, विचार, भाषा और व्यवहार की शुद्धि से सिद्धि की ओर अग्रसर होता है। उन्होंने कहा कि मोक्षमार्ग में भाव, विचार और भाषा की शुद्धि के बाद व्यवहार की शुद्धि का सबसे महत्वपूर्ण आधार विनम्रता है। उन्होंने कहा, "विनम्रता केवल औपचारिक सम्मान या चरण स्पर्श नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के अस्तित्व, भावनाओं और गरिमा का सम्मान करने का नाम है।" मुनिश्री ने कहा कि वास्तविक विनय छोटे-बड़े के भेद से परे प्रत्येक व्यक्ति के प्रति सम्मानपूर्ण दृष्टि रखने में है। बड़ों के प्रति विनय का अर्थ उनका बहुमान करना है, जबकि छोटों के प्रति विनय का अर्थ उनका स्नेहपूर्वक ध्यान रखना है। व्यक्ति का व्यवहार ऐसा होना चाहिए कि उसके सामने कोई भी स्वयं को छोटा या उपेक्षित महसूस न करे। यही सच्चे बड़प्पन की पहचान है।
उन्होंने कहा कि आज परिवारों में पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी का सबसे बड़ा कारण व्यवहार की कठोरता और संस्कारों का क्षरण है। बच्चे वही सीखते हैं जो अपने माता-पिता के आचरण में देखते हैं। यदि बड़े स्वयं अपने माता-पिता, गुरुजनों और बुजुर्गों का सम्मान करेंगे तो वही संस्कार अगली पीढ़ी तक सहज रूप से पहुँचेंगे। उन्होंने कहा, "बच्चे वह नहीं करते जो आप कहते हैं, बल्कि वही करते हैं जो आप करते हैं।" मुनिश्री ने कहा कि केवल चरण स्पर्श कर लेना विनय नहीं है। यदि उसके बाद बड़ों की बात बीच में काट दी जाए या उनके प्रति असम्मानजनक व्यवहार किया जाए तो वह केवल औपचारिकता और अभिनय भर है। असहमति भी संयम, शालीनता और सम्मान के साथ व्यक्त की जानी चाहिए। जैन परंपरा के 'तथाकार' भाव का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पहले सामने वाले की बात को स्वीकार करें, फिर विनम्रता के साथ अपना पक्ष रखें। इससे संवाद भी सार्थक बनता है और संबंध भी मधुर बने रहते हैं।
उन्होंने कहा कि बड़ों को भी केवल इसलिए किसी उचित सुझाव को अस्वीकार नहीं करना चाहिए कि वह किसी छोटे ने दिया है। विनम्र व्यक्ति की दृष्टि "मेरा सो खरा" नहीं, बल्कि "खरा सो मेरा" होती है। अहंकार व्यक्ति को अपनी भूल स्वीकारने नहीं देता और न ही दूसरों के गुण अपनाने देता है, जबकि विनम्र व्यक्ति अपनी त्रुटि स्वीकार करने और दूसरों की अच्छाइयों को ग्रहण करने में कभी संकोच नहीं करता।सहनशीलता को समर्थ व्यक्तित्व का आधार बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि जो जितना अधिक सहन करना सीखता है, वह उतना ही अधिक आत्मबल और सामर्थ्य अर्जित करता है। उन्होंने विनम्रता को व्यवहार में उतारने के चार सूत्र बताए—अहंकार का त्याग, सभी के प्रति सम्मानपूर्ण व्यवहार, दूसरों के अच्छे कार्य का श्रेय उन्हें देना तथा अपनी गलती स्वीकार कर आवश्यकता पड़ने पर क्षमा माँगने का साहस रखना। यही गुण व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावशाली और संबंधों को मधुर बनाते हैं।
उन्होंने श्रद्धालुओं का आह्वान करते हुए कहा कि प्रतिदिन स्वयं से संकल्प लें—"मुझे विनम्र रहना है।" जहाँ भी अहंकार का भाव दिखाई दे, वहाँ आत्मचिंतन और प्रतिक्रमण करें तथा विनम्र और संस्कारित लोगों की संगति अपनाएँ। इससे व्यवहार की शुद्धि के साथ आत्मिक विकास का मार्ग भी प्रशस्त होगा। उन्होंने कहा कि आज व्यक्तित्व विकास के लिए अनेक प्रशिक्षण दिए जा रहे हैं, जबकि हमारे धर्मशास्त्र और गुरुजन सदियों पहले जीवन को सफल बनाने के ये सरल सूत्र दे चुके हैं। प्रवचन केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में उतारने के लिए हैं। जब धर्म मस्तिष्क से उतरकर हृदय में स्थान बना लेता है, तभी जीवन में वास्तविक परिवर्तन आता है। आज मुनि समादर सागर महाराज ने केशलोँच कर सभी को वैराग्य, समता और आत्मबल का संदेश दिया! धर्मसभा में मुनि संधान सागर महाराज,सार सागर महाराज एवं रूप सागर महाराज विराजमान थे। संचालन बा. ब्रह्मचारी अशोक भैया ने किया।