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वानप्रस्थ जीवन अपनाकर आध्यात्मिक साधना को दें गति" : राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाणसागर।

गिरिडीह,शिखर दर्पण संवाददाता।

गिरीडीह शंका समाधान कार्यक्रम में मुनि प्रमाणसागर महाराज ने 60 वर्ष के बाद जीवन-प्रबंधन,पुनर्जन्म और भावनायोग पर दिया विशेष मार्गदर्शन देते हुये कहा 60 वर्ष की आयु के बाद जीवन को व्यवस्थित करने,पुनर्जन्म की अवधारणा को समझने तथा भावनायोग के प्रभाव पर महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि जीवन के इस पड़ाव को केवल विश्राम का समय न मानकर आत्मकल्याण, साधना और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर बनाना चाहिए। मुनिश्री ने कहा कि 60 वर्ष की आयु पूर्ण होने के बाद व्यक्ति को वानप्रस्थी जीवन की ओर बढ़ना चाहिए। वानप्रस्थ का अर्थ घर छोड़ना नहीं, बल्कि घर में रहते हुए धीरे-धीरे पारिवारिक मोह और व्यावहारिक दायित्वों से स्वयं को मुक्त करना है। व्यापार और परिवार की जिम्मेदारियां अगली पीढ़ी को सौंपकर व्यक्ति को अपना अधिकतम समय धर्म, साधना, स्वाध्याय और आत्मचिंतन में लगाना चाहिए।उन्होंने कहा कि अपने पास इतनी आर्थिक व्यवस्था अवश्य रखनी चाहिए कि जीवन के अंतिम पड़ाव में किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े।“या तो भरी जेब वाले बनो या बिना जेब वाले रहो, बीच वाले मत रहो।”वानप्रस्थी व्यक्ति को घर में मालिक की तरह नहीं, बल्कि मेहमान की तरह रहना चाहिए।

दायित्वों का हस्तांतरण केवल संपत्ति और अधिकार सौंपना नहीं, बल्कि अगली पीढ़ी को स्वतंत्र रूप से जिम्मेदारी निभाने का अवसर देना भी है।ऐसी हो वानप्रस्थी की दिनचर्या मुनिश्री ने वरिष्ठजनों की दिनचर्या बताते हुए कहा कि प्रातः जागरण के बाद नित्य क्रियाओं से निवृत्त होकर योग, ध्यान, भावनायोग और भ्रमण करें। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए योगासन को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। प्रतिदिन कम से कम एक घंटे का समय पाठ, स्तोत्र और सामायिक में दें। इसके बाद पूजन, स्वाध्याय और ध्यान के लिए समय निर्धारित करें।उन्होंने कहा कि शाम का समय भी प्रतिक्रमण, पाठ, भावनायोग और सामायिक में लगाया जाए। रात्रि में चारों प्रकार के आहार के त्याग का अभ्यास तथा अष्टमी-चतुर्दशी पर एकासन और उपवास जैसे संयम की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। इस प्रकार दिनचर्या को आध्यात्मिक गतिविधियों से जोड़कर जीवन के प्रत्येक दिन को साधना की दिशा में सार्थक बनाया जा सकता है।पुनर्जन्म को समझने के लिए जीवन की निरंतरता को समझें पुनर्जन्म के प्रमाण से जुड़े प्रश्न पर मुनिश्री ने कहा कि वर्तमान जीवन से पहले भी जीवन था और इसके बाद भी जीवन की निरंतरता बनी रहती है।


हर बात का प्रत्यक्ष प्रमाण आवश्यक नहीं होता। उन्होंने जीवन की अवस्थाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि आज यदि वृद्धावस्था दिखाई दे रही है तो उसके पीछे बचपन, यौवन और अन्य अवस्थाओं का क्रम रहा है। इसी प्रकार जीवन के क्रम और निरंतरता को समझने से पुनर्जन्म की अवधारणा को समझा जा सकता है।उन्होंने पुनर्जन्म से संबंधित शोध का उल्लेख करते हुए डॉ. इयान स्टीवेन्सन के अध्ययनों की जानकारी दी और कहा कि पुनर्जन्म से जुड़े अनेक प्रकरणों का वैज्ञानिक स्तर पर अध्ययन किया गया है।कार्यक्रम में एक श्रद्धालु ने भावनायोग का अनुभव साझा करते हुए बताया कि 24 मार्च को उनके रिश्तेदारों के परिवार के साथ गंभीर सड़क दुर्घटना हुई थी, जिसमें आठ-नौ लोग घायल हुए और परिवार के मुखिया का निधन हो गया। परिवार की एक महिला को कई फ्रैक्चर हुए और चिकित्सकों ने छह माह के पूर्ण विश्राम की सलाह दी थी। इसके बावजूद उन्होंने बिस्तर पर रहते हुए दोनों समय भावनायोग जारी रखा। श्रद्धालु के अनुसार लगभग साढ़े तीन माह में ही वे बिस्तर से उठकर धीरे-धीरे चलने और अपने छोटे-छोटे कार्य करने लगीं।

उन्होंने मुनिश्री से शीघ्र पूर्ण स्वस्थ होने तथा मंदिर जाकर दर्शन करने में सक्षम होने के लिए मंगल आशीर्वाद प्रदान करने का निवेदन किया। शंका समाधान के दौरान व्यक्ति की प्रतिभा और कार्यक्षमता को पहचानने के प्रश्न पर मुनिश्री ने कहा कि किसी व्यक्ति की स्किल को समझने के लिए केवल उसकी प्रोफाइल या अनुभव देखना पर्याप्त नहीं है। उसकी सोच, गतिविधियों, कार्यप्रणाली और निर्णय लेने के तरीके को निकटता से देखना चाहिए। अनुभवी और पारखी दृष्टि व्यक्ति के व्यवहार से उसकी क्षमता को पहचान सकती है।उन्होंने एक कंपनी में जनरल मैनेजर के चयन का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक व्यक्ति का इंटरव्यू और चयन हो चुका था, लेकिन कंपनी की परंपरा के अनुसार नियुक्ति से पहले CEO के साथ लंच होता था। लंच के दौरान उस व्यक्ति ने सूप चखे बिना उसमें नमक डाल दिया। CEO ने नियुक्ति पत्र देने से मना कर दिया। उनका कहना था कि समस्या नमक डालने की नहीं, बल्कि बिना चखे निर्णय लेने की है। ऐसा व्यक्ति जिम्मेदारी मिलने पर बिना विचार किए निर्णय ले सकता है। मुनिश्री ने कहा कि यही पारखी दृष्टि है। व्यक्ति को पहचानना हो तो उसकी वृत्तियों को निकटता से देखना चाहिए। उसकी सोच और व्यवहार को समझकर ही उसकी प्रतिभा का सही उपयोग किया जा सकता है। शंका समाधान कार्यक्रम में मुनिश्री ने वरिष्ठजनों को वानप्रस्थ जीवन की ओर बढ़ने, पारिवारिक दायित्वों को अगली पीढ़ी को सौंपने, पुनर्जन्म की अवधारणा को जीवन की निरंतरता के संदर्भ में समझने तथा भावनायोग को जीवन में अपनाने का संदेश दिया।


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