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युवाओं को धर्म से जोड़ने के लिए हृदय में धर्म का अनुराग जगाना जरूरी : राष्ट्रसंत- मुनि प्रमाण सागर।

गिरीडीह,शिखर दर्पण संवाददाता।

"अनुकूल वातावरण और गुरुजनों का मार्गदर्शन युवाओं को जीवन की सही दिशा प्रदान करता है उपरोक्त उदगार"शंकासमाधान प्रणेता राष्ट्रीय संत मुनि प्रमाण सागर महाराज ने युवाओं को धर्म से जोड़ने की बात करते हुये कही ।  शंकासमाधान के कार्यक्रम में  उपस्थित श्रद्धालु अपनी जिज्ञासाएं रखते हैं और मुनिश्री उनके आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक जीवन से जुड़े प्रश्नों का समाधान प्रदान करते हैं जिसे देश एवं विदेश से जुडे लाखों श्रद्धालु देखकर अपनी समस्याओं का समाधान प्राप्त करते है, कार्यक्रम में युवाओं के सबालों का जबाब देते हुये कहा कि धर्म का अर्थ केवल धार्मिक क्रियाओं से जोड़ना नहीं है।उनके हृदय में धर्म के प्रति आंतरिक अनुराग जगाना सबसे अधिक आवश्यक है। जब युवा के भीतर धर्म के प्रति सच्ची श्रद्धा और रुचि जागृत होगी, तो उसके जीवन की दिशा स्वतः प्रशस्त होगी।धर्मसभा में दिल्ली से आई वी. वी.ऐ कर रही युवती द्वारा शिक्षा, भविष्य और धर्म के साथ जुड़े रहने को लेकर पूछे गए प्रश्न पर मुनिश्री ने कहा कि धर्म से जुड़े रहने के भाव अत्यंत शुभ हैं। प्रत्येक युवा को यह बात गांठ में बांध लेनी चाहिए कि जीवन का वास्तविक कल्याण धर्म से ही होगा। मनुष्य चाहे जितनी भौतिक समृद्धि प्राप्त कर ले, लेकिन धर्म को आत्मसात किए बिना वास्तविक संतुष्टि प्राप्त नहीं हो सकती।असंतुष्ट रहते सारी भौतिक समृद्धि भी अर्थहीन हो जाती है।

उन्होंने कहा कि माता-पिता और परिवार से प्राप्त धार्मिक संस्कार तथा गुरुओं से मिली शिक्षाओं को जीवन की सबसे बड़ी संपदा मानकर चलें। शिक्षा और करियर के लिए कहीं भी जाना पड़े, अपनी धार्मिक निष्ठा को मजबूत बनाए रखें। अपनी प्राथमिकताओं को बदलने के बजाय संस्कारों को सुरक्षित रखने का संकल्प लें। मुनिश्री ने कहा कि प्रत्येक युवा को अपने जीवन में एक ऐसी सीमा रेखा अवश्य  निर्धारित करनी चाहिए, जिसे किसी भी परिस्थिति में पार न किया जाए। वातावरण और संगति चाहे जैसी हो, अपने संस्कारों और धार्मिक मूल्यों को प्रभावित नहीं होने देना चाहिए। अच्छी संगति, अनुकूल वातावरण और गुरुजनों का मार्गदर्शन युवाओं को जीवन की सही दिशा प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि संस्कार कभी पूरी तरह नष्ट नहीं होते, वे परिस्थितियों के कारण अवश्य हो सकते हैं। अनुकूल वातावरण मिलने पर वही संस्कार पुनः जागृत हो जाते हैं। इसलिए बचपन से मिले संस्कारों को गहराई प्रदान करना और जीवनभर उन्हें जीवित रखना आवश्यक है।इस अवसर पर परिवार एवं युवाओं के धर्म के प्रति समर्पण की सराहना करते हुए मुनि श्री समत्वसागर जी के गृहस्थ जीवन के पिता डा. अभय जैन विदिशा एवं माताजी  का अभिनंदन किया गया। मुनिश्री ने युवाओं को प्रेरित किया कि वे शिक्षा, करियर और भौतिक उपलब्धियों के साथ आध्यात्मिक संपदा को भी जीवन में समान महत्व दो? यही संतुलन जीवन को सार्थक और संतुष्ट बनाएगा।  मुनि श्री के मांगलिक प्रवचन प्रातः 8:30 तथा शंकासमाधान कार्यक्रम 6 बजे से संपन्न हो रहा है।


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