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धन के साथ पुण्य की संपत्ति बढ़ाना ही वास्तविक समृद्धि : मुनि प्रमाण सागर।

मधुवन,शिखर दर्पण संवाददाता। 

राष्ट्र संत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि मनुष्य को केवल धन-संपत्ति बढ़ाने की चिंता नहीं करनी चाहिए, बल्कि पुण्य की संपत्ति बढ़ाने का भी प्रयास करना चाहिए। सांसारिक धन यहीं रह जाता है, जबकि शुभ भाव, दान और परमार्थ की भावना ही जीवन की वास्तविक कमाई है। उक्त बातें उन्होंने मधुवन स्थित गुणायतन में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए कही। मुनि श्री ने कहा कि दान से पुण्य की वृद्धि होती है और पुण्यवृद्धि से जीवन में श्रीवृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान और परमार्थ को जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए। गृहस्थ के लिए त्याग का अर्थ सर्वस्व त्यागना नहीं, बल्कि अपनी आय और सामर्थ्य के अनुसार उसका एक अंश धर्म एवं समाज सेवा में लगाना है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति धन कमाए, बचत करे और परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करे, लेकिन धन के प्रति अत्यधिक आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। आय में खर्च, बचत और दान का संतुलन जरूरी है। दान केवल धन का ही नहीं, बल्कि ज्ञान, समय, श्रम और सद्भावना का भी किया जा सकता है।

मुनि श्री ने कहा कि पाप से डरना और पाप करने के बाद डरना, दोनों में बड़ा अंतर है। जो व्यक्ति पाप करने से पहले ही उससे बचने का प्रयास करता है, वह अपनी प्रवृत्तियों के प्रति सजग रहता है। संयम और जागरूकता के साथ जीवन जीना ही सच्चे अर्थों में धर्म का पालन है। प्रवचन के दौरान उन्होंने दान के महत्व को समझाने के लिए कई प्रेरक प्रसंग भी सुनाए। उन्होंने कहा कि कठिन आर्थिक परिस्थितियों में भी यदि व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान का भाव बनाए रखता है तो उसके भीतर उदारता और सकारात्मकता का विकास होता है। दान किसी पर एहसान नहीं, बल्कि स्वयं और समाज दोनों के कल्याण का माध्यम है। मुनि श्री ने कहा कि जीवन की वास्तविक समृद्धि केवल बैंक बैलेंस और संपत्ति से निर्धारित नहीं होती। व्यक्ति के शुभ भाव, उदारता, स्वाभिमान, पुरुषार्थ और परमार्थ की भावना ही उसकी वास्तविक संपन्नता है। इसलिए आर्थिक उन्नति के साथ प्रत्येक व्यक्ति को पुण्य की संपत्ति बढ़ाने का भी निरंतर प्रयास करना चाहिए।

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