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भगवान के पास श्रद्धा से जाएं, सौदेबाजी न करें : मुनि श्री प्रमाण सागर।

गिरिडीह,शिखर दर्पण संवाददाता।

राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि परिस्थितियों को बदलने के बजाय व्यक्ति को अपनी दृष्टि बदलनी चाहिए। जैसी श्रद्धा होगी, वैसी दृष्टि और जैसी दृष्टि होगी, वैसी ही सृष्टि दिखाई देगी। मुनि श्री ने यह बातें सोलह कारण भावना के अंतर्गत दर्शन विशुद्धि विषय पर प्रवचन करते हुए कहीं। उन्होंने कहा कि मनुष्य सुख और शांति के लिए धन, परिवार और इच्छाओं की पूर्ति में सुख तलाशता है, जबकि वास्तविक सुख व्यक्ति के भीतर है। संसार को अपने अनुरूप बनाने के बजाय स्वयं की सोच और दृष्टि को बदलना जरूरी है। मुनि श्री ने कहा कि भगवान के पास श्रद्धा से जाएं, सौदेबाजी न करें। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धा बढ़ाना और इच्छा पूरी न होने पर भगवान से शिकायत करना सच्ची श्रद्धा नहीं, बल्कि सौदेबाजी है। भगवान के चरणों में धन-संपत्ति मांगने के बजाय ऐसी दृष्टि मांगनी चाहिए, जिससे हर परिस्थिति में प्रसन्न और संतुलित रहा जा सके। उन्होंने कहा कि मंदिर में केवल भगवान की प्रतिमा देखना सामान्य दर्शन है।

वास्तविक दर्शन तब है, जब व्यक्ति भगवान के स्वरूप को देखकर अपने भीतर छिपी भगवत्ता को पहचानने का प्रयास करे। भगवान ने राग, द्वेष और मोह से मुक्त होकर आनंद का मार्ग दिखाया है। गुरु बोझ नहीं उठाते, बोझ से ऊपर उठने की दृष्टि देते हैं। उन्होंने कहा कि गुरु व्यक्ति की समस्याओं का बोझ अपने ऊपर नहीं लेते, बल्कि उनसे ऊपर उठने का मार्ग दिखाते हैं। इसी तरह शास्त्र केवल ज्ञान बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि अज्ञान और गलत धारणाओं को दूर करने के लिए पढ़े जाने चाहिए। मुनि श्री ने दृष्टि की निर्मलता का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार धूल लगे कांच से बाहर की दुनिया धुंधली दिखाई देती है, उसी प्रकार हमारी मिथ्या मान्यताएं, भय, लोभ और आसक्ति दृष्टि को प्रभावित करते हैं। इसलिए संसार को बदलने के बजाय अपनी दृष्टि को निर्मल करना चाहिए। प्रवचन के अंत में भावना योग के माध्यम से श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन कराया गया। उन्होंने कहा कि श्रद्धा में शुद्धि होगी तो दृष्टि निर्मल होगी और दृष्टि निर्मल होगी तो जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण बदल जाएगा। यही परिवर्तन आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की ओर आगे बढ़ने का मार्ग है।

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