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सिद्धचक्र महामंडल विधान के छठे दिन नामकर्म के आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक स्वरूप पर किया मार्गदर्शन, युवाओं के लिए विशेष संस्कार एवं व्यक्तित्व विकास शिविर का होगा आयोजन।

मधुबन,शिखर दर्पण संवाददाता। 

गुणायतन, मधुबन में चल रहे श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के छठे दिवस राष्ट्रसंत मुनि श्री 108 प्रमाणसागर महाराज ने श्रद्धालुओं को नामकर्म के गूढ़ आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक स्वरूप का सरल विवेचन किया। उन्होंने कहा कि “धर्म केवल बाहरी क्रियाओं से नहीं, बल्कि हमारे अंतःकरण के भावों से बनता है। जैसे हमारे भाव होंगे, वैसा ही नामकर्म बंधेगा और उसी के अनुरूप भविष्य में शरीर, व्यक्तित्व तथा जीवन की परिस्थितियां निर्मित होंगी।” मुनि श्री ने कहा कि नामकर्म का बंध मन, वचन और काय की प्रवृत्तियों पर निर्भर करता है। उन्होंने बताया कि आगामी दशलक्षण पर्व के अवसर पर युवाओं के लिए विशेष प्रयोगात्मक संस्कार एवं व्यक्तित्व विकास शिविर आयोजित करने का विचार है। उन्होंने धार्मिक संस्कारों से जुड़े परिवारों से अपील की कि जिन घरों में संस्कारवान बुजुर्ग एवं प्रतिमाधारी सदस्य हैं, वे अपने नियमों का पालन घर पर करते हुए अपने पुत्र-पुत्रियों एवं अन्य युवाओं को इस शिविर में भेजें। उन्होंने कहा कि यदि युवा पीढ़ी को धर्म और संस्कारों की सही दिशा मिलेगी तो समाज को संस्कारवान भविष्य प्राप्त होगा। भावना योग पर आधारित यह शिविर आध्यात्मिक जागरण, संस्कार निर्माण एवं व्यक्तित्व विकास का महत्वपूर्ण अवसर बनेगा।

मुनि श्री ने देश-विदेश में रहने वाले श्रद्धालुओं से अपने परिवार, रिश्तेदारों एवं परिचित युवाओं का पंजीकरण कराकर उन्हें इस आयोजन से जोड़ने का आग्रह किया। नामकर्म के महत्व को समझाते हुए उन्होंने कहा कि यह अघातिया कर्मों में प्रमुख है। यही कर्म जीव के शरीर, आकृति, गठन, वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, शक्ति, सौंदर्य, व्यक्तित्व तथा अनेक विशेषताओं का निर्धारण करता है। अगले जन्म में जीव को कैसा शरीर प्राप्त होगा तथा वह मनुष्य, देव, तिर्यंच अथवा नरक—किस गति में जन्म लेगा, इसका आधार भी नामकर्म ही है। मुनि श्री ने बताया कि जैन आगमों में नामकर्म की 93 प्रकृतियों का वर्णन मिलता है। इनमें शरीर, बंधन, संघात, संस्थान, संहनन, वर्ण, गंध, रस एवं स्पर्श सहित अनेक उपभेद शामिल हैं। उन्होंने कहा कि सरलता, पवित्रता, सात्त्विकता, पूजा, भक्ति, दान, व्रत, शील, उपवास और तप शुभ नामकर्म के कारण हैं, जबकि राग-द्वेष, अहंकार, माया, कपट, हिंसा, असत्य, चोरी, कुशील, परिग्रह तथा कषाययुक्त भाव अशुभ नामकर्म का बंध कराते हैं।

उन्होंने श्रद्धालुओं से क्षमा, विनय, मार्दव और आर्जव जैसे श्रेष्ठ भावों को अपनाने का आह्वान किया। साथ ही सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चरित्र, तप, स्वाध्याय, ध्यान, पंच परमेष्ठी की भक्ति एवं आत्मचिंतन का नियमित अभ्यास करने की प्रेरणा दी। इस अवसर पर मुनि श्री ने सभी श्रद्धालुओं से सामूहिक प्रार्थना भी कराई। उन्होंने कहा कि भगवान की आराधना का वास्तविक उद्देश्य अपने जीवन को आनंद, पवित्रता और निर्मल विचारों से भरना है। जब हमारे भाव शुद्ध होंगे, तभी हमारा जीवन वास्तव में शुभ, मंगलमय और धर्ममय बनेगा। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि रविवार होने के कारण आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान में शामिल हुए। इस अवसर पर गुणायतन एवं श्री सेवायतन से जुड़े पदाधिकारियों ने गुरुदेव के चरणों में श्रीफल अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

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