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चिकित्सा केवल व्यवसाय नहीं, मानव सेवा का श्रेष्ठ माध्यम है" — मुनि प्रमाण सागर ।

मधुवन,शिखर दर्पण संवाददाता।

“जब कोई भी विद्या केवल व्यवसाय बन जाती है, तब उसका प्रमुख उद्देश्य धनार्जन रह जाता है। चिकित्सा केवल व्यवसाय नहीं, सेवा का एक माध्यम है।” उक्त उद्गार मुनि प्रमाण सागर महाराज ने गुणायतन, मधुवन परिसर में आयोजित दैनिक शंकासमाधान कार्यक्रम के अंतर्गत एक चिकित्सक द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में व्यक्त किया । मुनि श्री ने कहा कि आज अधिकांश लोग मेडिकल शिक्षा को केवल एक पेशेवर अध्ययन और चिकित्सा को मात्र एक व्यवसाय के रूप में देखते हैं, जबकि चिकित्सक का वास्तविक दायित्व मानव सेवा है। उन्होंने कहा कि चिकित्सा क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए धन अवश्य कमाइए, परंतु धन कमाना जीवन का मुख्य लक्ष्य नहीं होना चाहिए। आपका प्रथम लक्ष्य मानव सेवा होना चाहिए। उन्होंने कहा, “धन कमाने की भावना रखने वाला व्यक्ति भी सेवाएँ देता है और सेवा-भाव रखने वाला व्यक्ति भी धन अर्जित करता है, अंतर केवल दृष्टिकोण का है।” जिसका लक्ष्य केवल धनार्जन होता है, वह धन तो कमा लेता है, किंतु धन के प्रति अत्यधिक आसक्ति उसे अनुचित मार्गों की ओर भी ले जा सकती है। वहीं जो सेवा को अपना ध्येय बनाता है, वह धन के साथ-साथ पुण्य का संचय भी करता है।

मुनिश्री ने कहा कि यह भी सत्य है कि आज मेडिकल शिक्षा अत्यंत महंगी हो चुकी है। लाखों रुपये खर्च होते हैं और पी.जी. तक पहुँचते-पहुँचते कई बार करोड़ों रुपये लग जाते हैं। जीवन के सात-आठ, कभी-कभी दस-दस वर्ष भी इस अध्ययन में समर्पित हो जाते हैं। ऐसे में आर्थिक दृष्टि का होना स्वाभाविक है, किंतु वह प्राथमिक नहीं, द्वितीयक होनी चाहिए। उन्होंने चिकित्सकों को संबोधित करते हुए कहा कि उनका प्रथम लक्ष्य अपने पेशे का निर्वहन पूर्ण निष्ठा, ईमानदारी और दक्षता के साथ करना होना चाहिए। मेडिकल एथिक्स भी यही सिखाती है कि चिकित्सक का मूल धर्म सेवा है। रोगी को केवल उपचार ही नहीं, संवेदनशीलता और विश्वास भी प्रदान करना चाहिए। मुनि श्री ने कहा कि चिकित्सक अपनी चिकित्सा सेवा के साथ धर्म की भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वे लोगों को अहिंसा और शाकाहार के लिए प्रेरित कर सकते हैं, स्वस्थ जीवनशैली अपनाने का मार्ग दिखा सकते हैं तथा भावनायोग, सदाचार और संयम से जोड़कर उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। यदि एक चिकित्सक रोग का उपचार करने के साथ-साथ व्यक्ति के जीवन-मूल्यों को भी ऊँचा उठाने का प्रयास करे, तो वह केवल शरीर का नहीं बल्कि पूरे समाज का उपचार करता है। ऐसा जीवन और ऐसी चिकित्सा निश्चित रूप से सार्थक, पुण्यदायी और कल्याणकारी सिद्ध होती है।

शंकासमाधान के दौरान मुनि श्री ने मन को अंतर्मुखी बनाने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जब मन विषयों और बाहरी आकर्षणों की ओर दौड़ता है, तब बहिर्मुखता बढ़ती है और जीवन में भटकाव उत्पन्न होता है। किंतु जैसे ही मन की दिशा बाहर से भीतर की ओर मुड़ती है, आत्मिक यात्रा का सूत्रपात हो जाता है। उन्होंने कहा कि मन को अंतर्मुखी बनाने के लिए उसकी दिशा बदलना सीखना होगा। बहिर्मुखी वृत्तियों को अंतर्मुखी बनाना ही साधना और अध्यात्म का सार है। जो मन संसार की वस्तुओं की ओर भाग रहा है, उसे अपने भीतर विराजमान परमात्मा से जोड़ देना चाहिए। जो बाहर की चमक-दमक पर ललचा रहा है, उसमें भीतर के सत्य की ललक जगानी चाहिए।मुनि श्री ने कहा कि एक बार आत्मानुभूति का स्वाद मिल जाए तो बाहरी विषयों की चाह स्वतः क्षीण होने लगती है। भीतर का आनंद जितना गहरा होता जाता है, बाहर के आकर्षण उतने ही फीके पड़ते जाते हैं। यही साधना की सफलता और अध्यात्म की उपलब्धि है। जब ये भाव जीवन में विकसित होने लगते हैं, तब जीवन का मार्ग प्रशस्त होता है, उद्देश्य स्पष्ट होता है और आत्मकल्याण की दिशा सुस्पष्ट हो जाती है।

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