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भावनायोग : तन, मन और चेतना के स्वास्थ्य का अभियान//योग दिवस पर राष्ट्रीय संत मुनि प्रमाण सागर महाराज का संदेश।

गिरीडीह,शिखर दर्पण संवाददाता।

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के पूर्व गुणायतन सम्मेद शिखर तीर्थराज में विराजमान मुनि  प्रमाण सागर महाराज ने योग के महत्व पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि योग भारत की प्राचीन ऋषि परंपरा की अमूल्य धरोहर है, जिसे आज पूरी दुनिया स्वास्थ्य और संतुलित जीवनशैली के प्रभावी माध्यम के रूप में अपना रही है। गुणायतन मध्य भारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि मुनि ने कहा कि केवल शरीर को स्वस्थ बना लेना ही पूर्ण स्वास्थ्य नहीं है। आज भौतिक संसाधनों और सुविधाओं के बावजूद लोगों के जीवन में तनाव, चिंता, अवसाद और असंतोष बढ़ रहा है। इसका मुख्य कारण मन और भावनाओं की शुद्धि पर पर्याप्त ध्यान न देना है।

मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य का जीवन केवल शरीर तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके मन, भाव और चेतना का भी उतना ही महत्व है। भावों से विचार, विचारों से व्यवहार और व्यवहार से जीवन का निर्माण होता है।

इसलिए सकारात्मक जीवन के लिए करुणा, मैत्री, क्षमा, कृतज्ञता और आत्मीयता जैसे भावों का विकास आवश्यक है। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर “भावनायोग” अभियान शुरू करने का आह्वान करते हुए कहा कि यह साधना मनुष्य को अपने भावों को समझने और शुद्ध करने की प्रेरणा देती है। भावनायोग केवल शरीर को स्वस्थ बनाने का अभ्यास नहीं, बल्कि मन को निर्मल, हृदय को संवेदनशील और चेतना को जागृत करने का मार्ग है।मुनिश्री ने कहा कि आज समाज को केवल स्वस्थ शरीर वाले नहीं, बल्कि स्वस्थ भावों वाले लोगों की आवश्यकता है। यदि मनुष्य के भीतर करुणा, प्रेम, संतोष और क्षमा का विकास होगा तो हिंसा, भ्रष्टाचार और संघर्ष स्वतः कम होंगे। अंत में उन्होंने सभी से संकल्प लेने का आग्रह किया कि योग दिवस पर शरीर के साथ-साथ अपने भावों को भी स्वस्थ बनाने के लिए प्रतिदिन आत्मचिंतन, स्वाध्याय, ध्यान और सकारात्मक चिंतन का अभ्यास करें।

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