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ज्ञान और अनुभूति एक-दूसरे की पर्याय हैं : मुनि प्रमाण सागर महाराज।

गिरिडीह,शिखर दर्पण संवाददाता। 

राष्ट्रीय संत मुनि प्रमाण सागर महाराज ने शंका समाधान कार्यक्रम में ज्ञान, अनुभूति, श्रद्धा और धर्म के व्यावहारिक स्वरूप पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ज्ञान और अनुभूति एक-दूसरे की पर्याय हैं। ज्ञान जब राग-द्वेष से जुड़ जाता है तो अनुभूति का रूप धारण कर लेता है। ज्ञानी व्यक्ति राग-द्वेष को आत्मा का स्वभाव नहीं मानता, बल्कि परभाव समझकर स्वयं को उससे अलग रखता है। प्रभु और गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा बनाए रखने के उपाय पर मुनिश्री ने कहा कि भगवान द्वारा निषिद्ध कार्यों से दूर रहना ही श्रद्धा को दृढ़ बनाने का सर्वोत्तम मार्ग है। उन्होंने तीर्थंकर भगवानों के अतिशयों का उल्लेख करते हुए कहा कि जैन आगम और शास्त्रों में तीर्थों तथा अतिशयों का विस्तृत वर्णन उपलब्ध है। कार्यक्रम में उड़ीसा से आए सराक जैन समाज के श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने जैन समाज की आर्थिक समृद्धि के रहस्य पर भी प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि जैन समाज केवल कमाने की कला ही नहीं जानता, बल्कि दान और सेवा की संस्कृति को भी अपने जीवन का अभिन्न अंग मानता है। परिश्रम, ईमानदारी, अनुशासन, संयम और धर्म के प्रति समर्पण ही उसकी सफलता के प्रमुख आधार हैं। उन्होंने कहा कि धन का वास्तविक महत्व उसके सदुपयोग में है। शिक्षा, स्वास्थ्य, धर्म और सामाजिक सेवा के क्षेत्रों में जैन समाज का योगदान सदैव उल्लेखनीय रहा है। यही कारण है कि आर्थिक समृद्धि के साथ समाज में उसकी प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता भी बनी रहती है। मुनिश्री ने श्री सम्मेद शिखर को निर्वाण भूमि तथा खंडगिरि को महान साधना स्थल बताते हुए श्रद्धालुओं को तीर्थ वंदना की विधि समझाई और धर्म के प्रति गहरी श्रद्धा बनाए रखने का संदेश दिया। मौके पर प्रातः भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा संपन्न हुई। उड़ीसा से लगभग 300 सराक जैन श्रद्धालु तीर्थ वंदना के लिए श्री सम्मेद शिखर पहुंचे। इस अवसर पर गुणायतन परिवार द्वारा सुचित्रा काला एवं प्रदीप काला का सम्मान भी किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर धर्मोपदेश का लाभ प्राप्त किया।

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