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स्वाध्याय आत्मजागरण और जीवन परिवर्तन का सशक्त माध्यम : मुनि प्रमाण सागर महाराज।

पीरटांड,शिखर दर्पण संवाददाता। 

स्वाध्याय का उद्देश्य केवल विद्वान या पंडित बनना नहीं, बल्कि अपनी अंतर्दृष्टि को जागृत कर जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना है। यह बात गुणायतन प्रणेता राष्ट्रसंत मुनि प्रमाण सागर महाराज ने विश्व योग दिवस के अवसर पर आयोजित शंका-समाधान सत्र में श्रद्धालुओं की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए कही। कार्यक्रम में भावनायोग से जुड़े विभिन्न अनुभव साझा किए गए तथा साधकों की शंकाओं का समाधान किया गया। इस दौरान मुनि श्री ने स्वाध्याय, आत्मचिंतन और भाव-विशुद्धि के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मन स्वभाव से चंचल होता है। यदि उसे श्रेष्ठ विषय और सही दिशा नहीं मिलती तो वह चिंता, राग-द्वेष और नकारात्मक विचारों में भटकने लगता है। ऐसे में स्वाध्याय मन को सकारात्मक दिशा देने का सर्वोत्तम साधन है। यह व्यक्ति के ज्ञान को बढ़ाने के साथ-साथ उसके विचारों को परिष्कृत कर जीवन में श्रेष्ठ संस्कारों का विकास करता है। मुनि ने कहा कि स्वाध्याय का वास्तविक उद्देश्य केवल जानकारी प्राप्त करना या अपनी विद्वत्ता का प्रदर्शन करना नहीं है।

अनेक लोग ग्रंथों का अध्ययन शास्त्रार्थ या दूसरों को प्रभावित करने के लिए करते हैं, लेकिन ऐसा अध्ययन आत्मकल्याण का कारण नहीं बनता। स्वाध्याय तभी सार्थक है जब वह व्यक्ति के भीतर जागृति उत्पन्न करे और सत्य को देखने की दृष्टि प्रदान करे। उन्होंने कहा, “हम पंडित बनने के लिए स्वाध्याय न करें, अपनी आँखें खोलने के लिए स्वाध्याय करें। यह महत्वपूर्ण नहीं कि हमने कितना पढ़ा, बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि पढ़ने से हमारे भीतर कितना परिवर्तन आया।” मुनि ने बताया कि स्वाध्याय व्यक्ति के परिणामों को निर्मल बनाता है। इससे विचारों में शुद्धता आती है, व्यवहार में मधुरता आती है तथा करुणा, क्षमा, विनम्रता और आत्मसंयम जैसे गुणों का विकास होता है। निरंतर स्वाध्याय भाव-विशुद्धि को बढ़ाता है और मनुष्य को आत्मोन्नति के मार्ग पर अग्रसर करता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में लोग बाहरी उपलब्धियों को ही सफलता मानने लगे हैं, जबकि वास्तविक सफलता अपने भीतर के अंधकार को दूर करने में है। स्वाध्याय व्यक्ति को अपने दोषों और कमजोरियों को पहचानने तथा आत्मपरिष्कार की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

स्वाध्याय की पद्धति पर प्रकाश डालते हुए मुनि श्री ने कहा कि जिज्ञासुओं को सबसे पहले जैन तत्त्वविद्या का अध्ययन करना चाहिए। इसके माध्यम से धर्म के मूल सिद्धांतों को समझना सरल हो जाता है और अन्य जैन ग्रंथों का मर्म भी सहजता से ग्रहण किया जा सकता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से प्रतिदिन कुछ समय स्वाध्याय के लिए निकालने का आह्वान करते हुए कहा कि जिस प्रकार शरीर के लिए भोजन आवश्यक है, उसी प्रकार मन और आत्मा के विकास के लिए सत्साहित्य का अध्ययन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि स्वाध्याय केवल पढ़ने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे जीवन में उतारने का प्रयास भी होना चाहिए। ज्ञान तभी सार्थक है जब वह आचरण में दिखाई दे। कार्यक्रम के अंत में श्रद्धालुओं ने मुनि श्री के प्रेरणादायी संदेश को जीवन में अपनाने तथा नियमित स्वाध्याय के माध्यम से आत्मजागरण और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प लिया।

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