संस्कारों की प्रथम पाठशाला माँ, णमोकार महामंत्र आत्मिक उत्कर्ष का आधार :मुनी प्रमाणसागर महाराज।
SHIKHAR DARPANWednesday, June 03, 2026
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मधुवन,शिखर दर्पण संवाददाता।
मधुवन स्थित गुणायतन परिसर में आयोजित शंका समाधान कार्यक्रम के तहत धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि माँ संस्कारों की प्रथम पाठशाला और पहली शिक्षिका होती है। यदि माँ संस्कारी, सदाचारी और आदर्श जीवन जीने वाली हो, तो उसके आचरण का सकारात्मक प्रभाव स्वाभाविक रूप से बच्चों पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि माँ के संस्कारों से परिवार में प्रेम, अनुशासन, विनम्रता और नैतिकता का विकास होता है। मुनि श्री ने कहा कि विद्यालय भी संस्कार निर्माण का महत्वपूर्ण केंद्र है। श्रेष्ठ संस्कारों का वातावरण तभी बन सकता है, जब शिक्षक स्वयं चरित्रवान, संस्कारी और आदर्श व्यक्तित्व वाले हों। बच्चे केवल पुस्तकों से ही नहीं, बल्कि माता-पिता और शिक्षकों के व्यवहार से भी सीखते हैं। इसलिए घरों को संस्कारों का मंदिर और विद्यालयों को संस्कारों का केंद्र बनाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि परिवार और विद्यालय दोनों स्थानों पर अच्छे संस्कारों का वातावरण होने से ही आदर्श नागरिकों का निर्माण होगा और राष्ट्र का भविष्य उज्ज्वल बनेगा।
गुणायतन मध्य भारत के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि धर्मसभा में मुनि श्री ने णमोकार महामंत्र को आत्मिक उत्कर्ष का आधार बताते हुए इसकी विशेषताओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जैन धर्म में णमोकार महामंत्र को अनादि-सिद्ध मंत्र माना गया है और सभी मंत्रों में इसका स्थान सर्वोपरि है। मुनि श्री ने बताया कि इस महामंत्र की पहली विशेषता यह है कि इसमें किसी देवता या बीजाक्षर का समावेश नहीं है, बल्कि केवल पंच परमेष्ठियों को नमस्कार किया गया है। दूसरी विशेषता यह है कि इसके प्रत्येक पद स्वयं में पूर्ण मंत्र हैं। तीसरी विशेषता यह है कि यह मंत्र अनादि-सिद्ध है, जिसे सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि श्रद्धापूर्वक जप और आराधना से आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है। चौथी विशेषता यह है कि इसका उपयोग केवल शांति, कल्याण और आत्मशुद्धि के लिए किया जाता है तथा इसे किसी भी प्रकार के अशुभ कार्यों में प्रयोग नहीं किया जा सकता। मंत्र साधना के संबंध में मुनि श्री ने कहा कि साधक का आचरण शुद्ध, विनम्र और श्रद्धायुक्त होना चाहिए। उन्होंने कहा कि ब्रह्मचर्यपूर्वक एवं समर्पित भाव से णमोकार महामंत्र की आराधना करने पर साधक को विशेष आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।