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व्यापार भारत में करो या विदेश में, भीतर भारतीयता बनी रहनी चाहिए : मुनि प्रमाणसागर।

पीरटांड़,शिखर दर्पण संवाददाता।

गुणायतन में विराजमान मुनि प्रमाणसागर ने व्यापार, विदेश प्रवास और स्टार्टअप संस्कृति को लेकर संतुलित एवं व्यावहारिक विचार व्यक्त किए। शंका समाधान कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि व्यापार के लिए देश-विदेश जाना कोई नई परंपरा नहीं है। प्राचीन काल में भी अनेक सेठ-साहूकार व्यापार के उद्देश्य से विदेश जाते थे और वर्षों बाद लौटते थे। इसलिए व्यापार के लिए विदेश जाना गलत नहीं है, लेकिन व्यक्ति भारत में रहे या विदेश में, उसके भीतर भारतीय संस्कार और भारतीयता सदैव जीवित रहनी चाहिए। मुनिश्री ने कहा कि वर्तमान समय में कोई भी बड़ा निर्णय बहुत सोच-समझकर लेना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आज भारत में व्यापार और सेवा क्षेत्र में तेजी से नई संभावनाएं विकसित हो रही हैं, वहीं विदेशों की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां भी लगातार बदल रही हैं। ऐसे में विदेश जाने वाले व्यक्ति को सभी संभावनाओं और जोखिमों का विवेकपूर्ण आकलन कर ही निर्णय लेना चाहिए।

व्यापार के संबंध में उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि कई लोग बड़ी छलांग लगाने का प्रयास करते हैं, लेकिन उसे संभाल नहीं पाते और आर्थिक रूप से टूट जाते हैं। इसलिए पहले अपनी सामर्थ्य, संसाधनों और परिस्थितियों का सही मूल्यांकन आवश्यक है। स्टार्टअप संस्कृति पर विचार रखते हुए मुनिश्री ने कहा कि इस क्षेत्र में संभावनाएं तो अच्छी हैं, लेकिन सफलता तभी मिलती है जब व्यक्ति की क्षमता मजबूत हो और लक्ष्य स्पष्ट हो। उन्होंने बताया कि उनके संपर्क में ऐसे कई युवा आए जिन्होंने स्टार्टअप के नाम पर अपने जीवन के कई वर्ष गंवा दिए। हजारों लोग स्टार्टअप शुरू करते हैं और अनेक सफल भी होते हैं, लेकिन हर व्यक्ति सफल हो यह जरूरी नहीं है। इसलिए इस क्षेत्र में सोच-समझकर और विवेकपूर्वक आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है, वे कुछ वर्षों तक संघर्ष कर भी लें तो परिवार पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन सीमित संसाधनों वाले लोग यदि बिना तैयारी के बड़े जोखिम उठा लें और असफल हो जाएं तो उनका जीवन संकट में पड़ सकता है।

मुनिश्री ने कहा कि जिन लोगों का पहले से अच्छा कारोबार है, उन्हें दूसरों के व्यवसाय में जुड़ने के बजाय अपने व्यापार को नई तकनीक और आधुनिक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कई युवाओं ने उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपने पारिवारिक व्यवसाय में तकनीक का उपयोग किया और परिणामस्वरूप व्यापार में कई गुना वृद्धि हुई। उन्होंने कहा कि व्यापार केवल धन कमाने का माध्यम नहीं है, बल्कि अर्थोपार्जन के साथ परिवार, समाज, धर्म और व्यक्तिगत जीवन का संतुलन भी आवश्यक है। व्यक्ति को वही मार्ग चुनना चाहिए जहां जीवन के सभी पक्ष स्वस्थ और संतुलित रूप से आगे बढ़ सकें। इस दौरान राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने जानकारी दी कि आगामी 25 जून से 30 जून 2026 तक गुणायतन परिसर में “पावनधाम जिनालय” के जिनबिंबों का पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव मुनि प्रमाणसागर ससंघ के सानिध्य में आयोजित किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि यह आयोजन गुणायतन मंदिर के मुख्य पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव का नहीं है, क्योंकि मंदिर का निर्माण कार्य अभी जारी है। उन्होंने बताया कि यह पंचकल्याणक महोत्सव पावनधाम में स्थापित होने वाली जिन प्रतिमाओं एवं आगामी दिनों में 108 मंडलों के साथ आयोजित सिद्धचक्र आराधना के लिए 108 जिन प्रतिमाओं को समर्पित होगा। जिन परिवारों को जिनबिंब विराजमान कराने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है, उनसे अनुकूलता बनाकर आयोजन में शामिल होने की अपील की गई। साथ ही 25 जून से 30 जून तक आयोजित इस पावन पंचकल्याणक महोत्सव में अधिक से अधिक श्रद्धालुओं से सपरिवार पहुंचकर धर्मलाभ प्राप्त करने का आह्वान किया गया।

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