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“अहिंसा” ही मानवता की मूल भावना, प्रत्येक प्राणी के प्रति संवेदनशील बनें : मुनि प्रमाणसागर।

पीरटांड,शिखर दर्पण संवाददाता।

भगवान महावीर के संदेश “परस्परोपग्रहो जीवानाम्” का उल्लेख करते हुए मुनि श्री प्रमाणसागर ने गुणायतन में आयोजित शंकासमाधान कार्यक्रम में एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि यह सूत्र केवल एक दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन का आधार है। इसका अर्थ है कि सभी जीव एक-दूसरे के उपकार और सहयोग के लिए हैं। जब मनुष्य इस भावना को अपने जीवन में उतार लेता है, तब उसके भीतर अहंकार, हिंसा और स्वार्थ स्वतः समाप्त होने लगते हैं। उन्होंने कहा कि अहिंसा की भावना संवेदनशीलता से विकसित होती है और संवेदनशीलता तब जागृत होती है, जब हम प्रत्येक प्राणी को अपने समान समझते हैं। यदि किसी जीव को पीड़ा पहुँचती है और उसे देखकर हमारे भीतर करुणा का भाव जागृत नहीं होता, तो इसका अर्थ है कि हमारी संवेदनाएँ अभी पूर्ण रूप से जागृत नहीं हुई हैं। धर्म का वास्तविक स्वरूप केवल मंदिरों और अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवों के प्रति दया, करुणा और संरक्षण के भाव में प्रकट होता है। मुनि प्रमाणसागर ने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों को प्रारंभ से ही करुणा, दया और सहअस्तित्व के संस्कार दिए जाएँ।

उन्हें यह शिक्षा दी जाए कि मानव जीवन भक्षण के लिए नहीं, बल्कि रक्षण के लिए मिला है। यदि हम किसी को जीवन नहीं दे सकते, तो किसी का जीवन लेने का अधिकार भी हमें नहीं है। यही विचार मनुष्य को श्रेष्ठ बनाता है और समाज को शांतिपूर्ण दिशा प्रदान करता है।उन्होंने आह्वान किया कि जिस प्रकार मनुष्य दूसरे मनुष्य की रक्षा के लिए तत्पर रहता है, उसी प्रकार उसे समस्त जीवों और प्राणियों की रक्षा के लिए भी जागरूक और संवेदनशील बनना चाहिए। प्रकृति, पर्यावरण और जीव-जगत की रक्षा ही सच्चे अर्थों में धर्म की साधना है। अहिंसा केवल विचार नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पवित्र पद्धति है, जो विश्व में शांति, प्रेम और सौहार्द स्थापित कर सकती है, उन्होंने कहा कि जैसे मनुष्य जीना चाहता है, वैसे ही संसार का प्रत्येक प्राणी भी जीना चाहता है। अंतर केवल इतना है कि मनुष्य अपनी पीड़ा को शब्दों में व्यक्त कर सकता है, जबकि मूक प्राणी अपनी वेदना व्यक्त नहीं कर पाते। वे बेजुबान अवश्य हैं, लेकिन बेजान नहीं। उनमें भी प्राण हैं, भावनाएँ हैं, संवेदनाएँ हैं और पीड़ा का अनुभव करने की क्षमता है। इसलिए किसी भी जीव को कष्ट पहुँचाना मानवता के विरुद्ध है।

उपरोक्त जानकारी राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने देते हुए बताया  मुनि प्रमाणसागर ने भारतीय संस्कृति को “जियो और जीने दो” के आदर्श पर आधारित संस्कृति बताते हुए कहा कि “आत्मोपम्य” और “वसुधैव कुटुम्बकम्” जैसी महान भावनाओं का मूल भाव यही है कि संसार का प्रत्येक जीव एक-दूसरे के सहयोग और संरक्षण के लिए है। जब मनुष्य प्रत्येक प्राणी में अपने समान आत्मा का अनुभव करने लगता है, तभी उसके भीतर सच्ची संवेदनशीलता जागृत होती है।उन्होंने कहा कि संसार में अक्सर यह कहा जाता है कि “बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है।” यह विचार पशु प्रवृत्ति का प्रतीक हो सकता है, लेकिन मनुष्य का जीवन केवल भोग और बल पर आधारित नहीं है। यह जंगल का नियम हो सकता है, जहाँ एक प्राणी दूसरे का भक्षण करता है, परंतु मानव समाज में हिंसा और क्रूरता को कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता। सभ्य समाज की पहचान दया, करुणा और सहअस्तित्व से होती है,न कि शोषण और विनाश से मुनि ने कहा कि अन्य धर्म मुख्यतः मानवीय स्तर पर अहिंसा की बात करते हैं, लेकिन जैन धर्म सूक्ष्मतम जीवों तक की रक्षा और अहिंसा का संदेश देता है। जैन दर्शन का यह दृष्टिकोण विश्व मानवता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी है।

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