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"स्वाध्याय का वास्तविक उद्देश्य आत्मशुद्धि और आत्मबोध":-मुनि प्रमाण सागर महाराज।

पीरटांड,शिखर दर्पण संवाददाता।

स्वाध्याय केवल शास्त्रों का अध्ययन नहीं,बल्कि आत्मा की शुद्धि और जीवन के रूपांतरण का माध्यम है,ज्ञान का उद्देश्य मात्र जानकारी एकत्र करना नहीं, बल्कि आत्मबोध और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना होना चाहिए।” उक्त उद्गार मुनि प्रमाण सागर महाराज ने सांयकालीन शंकासमाधान में एक प्रश्न के उत्तर में व्यक्त किए। गुणायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने जानकारी देते हुए बताया कि मुनि ने कहा कि यदि स्वाध्याय केवल वाद-विवाद, पांडित्य प्रदर्शन अथवा दूसरों को उपदेश देने तक सीमित रह जाए, तो व्यक्ति विद्वान तो बन सकता है, किंतु वास्तविक अर्थों में “पंडित” नहीं बन सकता। शास्त्रों में कहा गया है—“पिण्डाद् देहादात्मानं भिन्नम् एति सः पण्डितः।”अर्थात् जो आत्मा को शरीर से भिन्न जान लेता है, वही सच्चा पंडित है। शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा शाश्वत, चेतन एवं स्वतंत्र सत्ता है। इसी भेद-विज्ञान की अनुभूति स्वाध्याय का वास्तविक सार है।

मुनि श्री ने जैन दर्शन के प्रसिद्ध सूत्र “आत्मा सो परमात्मा” की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की पूर्ण संभावना विद्यमान है। आत्मा और परमात्मा में कोई मौलिक भेद नहीं, केवल अवस्था का अंतर है। राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे विकारों से आच्छादित आत्मा संसारी जीव कहलाती है, जबकि समस्त कर्मों और विकारों से मुक्त आत्मा परमात्मा बन जाती है। उन्होंने कहा कि आत्मा अपने स्वभाव से अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत शक्ति से सम्पन्न है, किंतु कर्मों की कालिमा उसके वास्तविक स्वरूप को ढक देती है। इसे स्पष्ट करते हुए मुनि ने स्वर्ण का उदाहरण दिया कि जैसे अग्नि में तपने के बाद स्वर्ण की शुद्धता और चमक प्रकट होती है, उसी प्रकार तप, संयम, साधना, स्वाध्याय और सम्यक् दर्शन के माध्यम से आत्मा पर चढ़े कर्मों का क्षय होता है और उसका शुद्ध स्वरूप प्रकट होता है।

मुनि ने जैन दर्शन के सात तत्त्वों — जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष — का उल्लेख करते हुए कहा कि राग-द्वेष और मोह के कारण कर्म आत्मा से बंधते हैं। संयम, समता और विवेक से नए कर्मों का आगमन रुकता है, जिसे “संवर” कहा गया है; वहीं तप, ध्यान, क्षमा, स्वाध्याय और आत्मचिंतन के माध्यम से पूर्व संचित कर्मों का क्षय “निर्जरा” कहलाता है। उन्होंने कहा कि मोक्षमार्ग का आधार जैन धर्म के त्रिरत्न — सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र — हैं। इन्हीं के माध्यम से आत्मा विकारों से मुक्त होकर अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त करती है। मुनि ने कहा कि जैन साधना का मूल उद्देश्य केवल पूजा-अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा को विकारों से मुक्त कर आत्मा से परमात्मा बनने की दिशा में पुरुषार्थ करना है। मनुष्य अनादिकाल से कर्मबंधन में बंधा अवश्य है, किंतु वह सदा बंधा रहने के लिए अभिशप्त नहीं है। जो व्यक्ति अपनी दुर्बलताओं को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करता है, वही वास्तविक अर्थों में मोक्षमार्ग पर अग्रसर होता है। इस अवसर पर संचालन मुनि संधान सागर महाराज ने किया।

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