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रीवा हादसे पर मधुबन के जैन समाज में आक्रोश, संत सुरक्षा नीति की उठी मांग।

पीरटांड,शिखर दर्पण संवाददाता।

मध्यप्रदेश के रीवा में जैन आर्यिकाओं को वाहन से कुचलने की घटना को लेकर देशभर के जैन समाज में गहरा आक्रोश है। इसी क्रम में मधुवन स्थित गुणायतन में आयोजित प्रातःकालीन धर्मसभा में मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने घटना को “साधारण दुर्घटना नहीं, बल्कि अत्यंत जघन्य कृत्य” बताया। उन्होंने कहा कि देश में लगातार साधु-संतों पर हमले और दुर्घटनाएं चिंता का विषय बन चुकी हैं। जैन समाज सदैव अहिंसा और शांति का उपासक रहा है, लेकिन अब केवल प्रतिक्रिया नहीं बल्कि स्थायी समाधान आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि साधु-संतों के विहार पर खतरा बढ़ता रहा तो साधु-संस्कृति का प्रवाह प्रभावित होगा। मुनि श्री ने कहा कि साधु-संत समाज के आध्यात्मिक मार्गदर्शक होते हैं और उनके निर्बाध विहार की सुरक्षा सुनिश्चित करना शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी है। 

उन्होंने सरकार से पैदल विहार करने वाले साधु-संतों की सुरक्षा हेतु विशेष नियम एवं प्रावधान लागू करने की मांग की।धर्मसभा में उन्होंने यह भी कहा कि केवल एक दिन की मौन रैली से समाधान नहीं निकलेगा, बल्कि जब तक स्थायी व्यवस्था नहीं बनती, तब तक समाज को जागरूक और सक्रिय रहना होगा। उन्होंने समाज से भी अपील की कि संतों के विहार की पूर्व सूचना प्रशासन को दी जाए तथा स्वयंसेवक भी सुरक्षा सहयोग में आगे आएं। मुनि श्री ने दिवंगत आर्यिका श्रुतमति माताजी एवं आर्यिका उपशममति माताजी के निधन पर गहरा दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि उपलब्ध वीडियो क्लिप्स को देखकर घटना के पीछे साजिश की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने सरकार से SIT द्वारा निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों पर कठोर कार्रवाई की मांग की।

इस अवसर पर अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि संतों के आह्वान पर देशभर में जिला प्रशासन के माध्यम से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री एवं राज्यपाल सहित अन्य संवैधानिक पदाधिकारियों को ज्ञापन सौंपे गए। मधुवन जैन समाज ने भी मौन रैली निकालकर जिला प्रशासन को पांच सूत्रीय ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में संत सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू करने, विहार मार्गों पर पुलिस सहयोग, ट्रैफिक नियंत्रण, चेतावनी संकेतक लगाने, संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष सुरक्षा व्यवस्था तथा “राष्ट्रीय संत सुरक्षा नीति” बनाने की मांग की गई। इसके अलावा संतों के विरुद्ध अपराधों को विशेष संवेदनशील श्रेणी में रखने और प्रशासन एवं समाज के बीच समन्वय तंत्र विकसित करने की भी मांग उठाई गई। जैन समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि समाज सदैव शांति, अहिंसा और संवैधानिक मर्यादाओं में विश्वास रखता है। उनका उद्देश्य किसी प्रकार का तनाव पैदा करना नहीं, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना और तपस्वी संतों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

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