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जैन धर्म केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि मानवता, सह-अस्तित्व, आत्मशुद्धि और विश्वशांति का वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक दर्शन हैः- मुनि प्रमाणसागर।

गिरिडीह,शिखर दर्पण संवाददाता।

“अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांत और आत्मोत्थान का जो संदेश जैन धर्म देता है, वह आज पूरे विश्व के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।” उपरोक्त उद्गार गुणायतन में विराजमान राष्ट्रीय संत मुनि प्रमाणसागर ने शंकासमाधान कार्यक्रम में एक प्रश्न के उत्तर में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि “जैन धर्म भारत के प्राचीनतम धर्मों में से एक है। इसका संबंध उतना ही प्राचीन है जितनी भारतीय संस्कृति स्वयं। जैन धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन को शुद्ध, शांत और समतामय बनाने वाला दर्शन है।”उन्होंने जैन धर्म की चार प्रमुख विशेषताएँ बताते हुए कहा कि जैन धर्म की सबसे बड़ी पहचान “अहिंसा” है। यह अहिंसा केवल किसी प्राणी की हत्या न करने तक सीमित नहीं, बल्कि मन, वचन और व्यवहार से भी किसी को पीड़ा न पहुँचाने की भावना है। जैन दर्शन में सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव की रक्षा का विधान है। चींटी से लेकर हाथी तक प्रत्येक जीव के अस्तित्व को स्वीकार कर सम्मान दिया गया है।

मुनि ने कहा कि यदि संसार जैन धर्म की अहिंसा को अपना ले, तो वर्तमान में चल रहे युद्ध, आतंक, हिंसा और पर्यावरण संकट जैसी समस्याएँ बहुत हद तक समाप्त हो सकती हैं। उन्होंने “अहिंसा” को दो भागों में विभाजित किया— पहला “महाव्रत”, जिसका पालन जैन मुनि पूर्ण रूप से करते हैं, तथा दूसरा “अणुव्रत”, जिसे गृहस्थ अपने जीवन की आवश्यकताओं के अनुसार अपनाते हैं। अपरिग्रह की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि “आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना” जैन धर्म का मूल संदेश है। जैन मुनि इसका चरम आदर्श प्रस्तुत करते हैं; वे अपने पास कुछ भी संग्रह नहीं रखते। गृहस्थों के लिए “परिग्रह-परिमाण” का सिद्धांत बताया गया है, अर्थात आवश्यकता अनुसार सीमित साधनों का उपयोग करना। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन मानता है कि अधिक संग्रह सामाजिक असमानता और अभाव को जन्म देता है। जहाँ एक ओर अत्यधिक संचय होगा, वहीं दूसरी ओर अभाव अवश्य उत्पन्न होगा। इसलिए सामाजिक समता के लिए अपरिग्रह अत्यंत आवश्यक है।

मुनि ने कहा कि जैन धर्म के अनेकांतवाद में अद्भुत विशेषता है, जिसमें वैचारिक सहिष्णुता का व्यापक दृष्टिकोण है। जैन दर्शन कहता है कि वस्तु केवल वैसी नहीं होती जैसी हमें दिखाई देती है; उसे अनेक दृष्टियों से समझना पड़ता है। उदाहरणस्वरूप यदि भारत में कोई पूछे “हिमालय किधर है?” तो उत्तर मिलेगा “उत्तर में”, लेकिन चीन में वही प्रश्न पूछने पर उत्तर होगा “दक्षिण में”। दोनों उत्तर अपने-अपने दृष्टिकोण से सही हैं। यही अनेकांत है — सत्य को विभिन्न दृष्टियों से स्वीकार करना। उन्होंने कहा कि यदि संसार अनेकांत की भावना को अपना ले, तो वैचारिक संघर्ष और कट्टरता बहुत कम हो सकती है।इसी के साथ मुनि ने “कर्मणा वर्ण व्यवस्था” के संदर्भ में विचार व्यक्त करते हुए कहा कि जैन धर्म जन्म से नहीं, कर्म से मनुष्य की श्रेष्ठता मानता है। जैन दर्शन का स्पष्ट सिद्धांत है— “मनुष्य जन्म से नहीं, कर्म से महान बनता है।” जो सदाचार और ज्ञान से युक्त है वही ब्राह्मण है; जो रक्षा करे वह क्षत्रिय; जो व्यापार करे वह वैश्य; और जो सेवा या शिल्प से जीविका चलाए वह शूद्र कहलाता है। इस प्रकार जैन धर्म सामाजिक समता और कर्मप्रधान जीवन का संदेश देता है।

उन्होंने जैन दर्शन के मुख्य सिद्धांत बताते हुए कहा—
*सृष्टि शाश्वत है:-
जैन दर्शन के अनुसार संसार अनादि और अनंत है। इसका न कोई निर्माता है और न कोई संहारक। संसार स्वाभाविक नियमों से चलता है। हर वस्तु में निरंतर परिवर्तन होता रहता है— उत्पत्ति, विनाश और स्थायित्व — ये तीनों साथ-साथ चलते हैं।
*आत्मा ही परमात्मा है:-
जैन दर्शन किसी ऐसे सर्वशक्तिमान ईश्वर को स्वीकार नहीं करता जो मनुष्य को दंड या पुरस्कार देता हो। जैन दर्शन कहता है— हर आत्मा में परमात्मा बनने की क्षमता है। जब आत्मा अपने राग, द्वेष और मोह को समाप्त कर देती है, तब वही आत्मा परमात्मा बन जाती है।
*बंधन और उसके कारण:-
संसार का प्रत्येक जीव कर्मों के बंधन में बँधा हुआ है। बंधन का कारण है— राग, द्वेष और मोह। जब तक ये विकार बने रहेंगे, तब तक जीव संसार में दुःख भोगता रहेगा।

*मुक्ति और उसके कारण:-
जैन धर्म कहता है कि मुक्ति संभव है। मुक्ति का मार्ग है—
सम्यक दर्शन — आत्मा के सत्य स्वरूप में श्रद्धा
सम्यक ज्ञान — आत्मा और तत्वों का सही ज्ञान
सम्यक चारित्र — आत्महित के अनुरूप सदाचारपूर्ण जीवन
इन्हीं तीनों को जैन धर्म में “रत्नत्रय” कहा गया है।
अंत में मुनि श्री प्रमाणसागर ने कहा—
“जैन धर्म केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि मानवता, सह-अस्तित्व, आत्मशुद्धि और विश्वशांति का वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक दर्शन है। अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांत और आत्मोत्थान का जो संदेश जैन धर्म देता है, वह आज पूरे विश्व के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।”
उपरोक्त जानकारी देते हुए प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि प्रतिदिन सांयकाल 6:20 से 7:20 बजे तक मुनि श्री द्वारा सामाजिक एवं धार्मिक विषयों पर शंकासमाधान कार्यक्रम आयोजित किया जाता है, जिसमें लाखों श्रोता ऑनलाइन जुड़कर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त करते हैं।

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