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पाप के निमित्त से बचोगे तभी पाप से बच पाओगे"।“अहिंसा” केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवनशैली है"- -मुनि प्रमाणसागर।

पीरटांड,शिखर दर्पण संवाददाता।

“पाप केवल बड़े अपराधों से नहीं, बल्कि हमारी असावधानी, प्रमाद और अज्ञान से भी होता है” यह उद्गार प्रमाणसागर महाराज ने संध्याकालीन शंकासमाधान सभा में व्यक्त किए।मुनिश्री ने कहा कि केवल पाप से डरना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि जीवन को शुभ दिशा देना भी आवश्यक है। भगवान का स्मरण, स्वाध्याय, जप, ध्यान और सत्संग मन को निर्मल बनाते हैं। जब मन शुभ में लग जाता है, तब अशुभ प्रवृत्तियाँ स्वतः छूटने लगती हैं। उन्होंने कहा कि “पाप के निमित्तों से बचोगे तभी पाप से बच पाओगे।” वास्तव में पाप बाहर से नहीं, बल्कि भीतर की असावधानी और प्रमाद से जन्म लेता है। जो व्यक्ति अंतरंग में जागरूक रहता है, वही धीरे-धीरे आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर होता है।मुनिश्री ने कहा कि जैसे ही मनुष्य सजग होकर जीना प्रारंभ करता है, उसके जीवन में परिवर्तन आने लगता है। यदि चलने, बोलने, खाने, कमाने और व्यवहार करने में उसका विवेक जाग्रत हो जाए कि “मेरे कारण किसी जीव को कष्ट तो नहीं पहुँच रहा”, तभी से धर्म का वास्तविक आरंभ हो जाता है।जैन दर्शन में “समिति” और “गुप्ति” के महत्व को बताते हुए उन्होंने कहा कि सावधानीपूर्वक चलना, संयमित वाणी बोलना, मर्यादित भोजन करना तथा शुद्ध भाव से व्यवहार करना ही पाप के द्वारों को बंद करने का माध्यम है। "धर्म केवल विचार नहीं, बल्कि व्यवहार और चरित्र का विषय है"।

मुनिश्री ने गृहस्थ जीवन के लिए बताए गए “आठ मूलगुणों” का महत्व समझाते हुए कहा कि मद्य (नशा), मांस, मधु (शहद) तथा पाँच उदुम्बर फलों — बड़, पीपल, पाकड़, उमर और कठूमर आदि का त्याग करने वाला ही अष्टमूलगुणों का धारक कहलाता है। इन पदार्थों के सेवन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हिंसा जुड़ी होने के कारण इन्हें त्यागना आवश्यक है। उन्होंने गुटखा, तंबाकू, नशीले पदार्थों तथा दवाइयों में मद्य और शहद के उपयोग से बचने की प्रेरणा देते हुए इनके प्रतिज्ञापूर्वक त्याग का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि “अहिंसा” केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवनशैली है" और जैनत्व की पहचान बाहरी नाम से नहीं, बल्कि संयमित आचरण से होती है।धर्म और अध्यात्म के अंतर को स्पष्ट करते हुए मुनिश्री ने कहा कि धर्म बाहरी आचरण, पूजा, व्रत, मंदिर, विधि और क्रियाओं से जुड़ा होता है, जबकि अध्यात्म भीतर की जागृति, आत्मचिंतन, संवेदनशीलता, शुद्ध भाव और आत्मानुभूति से संबंधित है। धर्म को “किया” जाता है, लेकिन अध्यात्म को “जिया” जाता है। कोई व्यक्ति धार्मिक क्रियाएँ तो कर सकता है, लेकिन यदि उसके भीतर करुणा, विनम्रता और आत्मबोध नहीं है, तो वह केवल कर्मकाण्ड तक सीमित रह जाता है।उन्होंने कहा कि “हर धार्मिक व्यक्ति आध्यात्मिक हो, यह आवश्यक नहीं; लेकिन जो सच में आध्यात्मिक है, उसके जीवन में धर्म अपने आप उतर आता है।” अध्यात्म भीतर की सुगंध है और धर्म उसका बाहरी पुष्प। जब भीतर अध्यात्म जागता है, तब पूजा में प्राण, साधना में रस और जीवन में आनंद का अनुभव होता है।उक्त जानकारी अविनाश जैन विद्यावाणी ने देते हुए बताया कि प्रतिदिन टी.वी. चैनल कार्यक्रम “शंकासमाधान” के माध्यम से देश-विदेश के लाखों लोग अपनी धार्मिक एवं सामाजिक जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त कर रहे हैं।

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