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हादसे से नहीं जागी व्यवस्था इसरी बाजार में फिर सड़क पर कब्जा, आदेश बेअसर।

डुमरी,शिखर दर्पण संवाददाता।

इसरी बाजार में हुई हृदयविदारक घटना को अभी महज पांच दिन ही बीते हैं। हादसे के बाद प्रशासनिक बैठकों का दौर चला, निर्देश जारी हुए, सुरक्षा और व्यवस्था को लेकर लंबी-लंबी बातें हुईं, लेकिन बाजार की तस्वीर देखकर लगता है कि लोगों ने उस दर्दनाक घटना को “पुरानी खबर” मानकर फिर से पुराने ढर्रे को ही गले लगा लिया है। 11 मई को अनुमंडल कार्यालय सभागार में जनप्रतिनिधियों और व्यवसायियों के साथ हुई बैठक में पुलिस-प्रशासन ने कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये थे। इनमें वनांचल चौक से इसरी बाजार चौक और स्टेशन रोड तक अतिक्रमण हटाने, फुटपाथ खाली कराने, टेम्पो-टोटो को निर्धारित स्थल पर खड़ा करने, सड़क किनारे सब्जी बिक्री और ठेला-गुमटी पर रोक लगाने तथा दिन में भारी वाहनों के बाजार में प्रवेश पर प्रतिबंध जैसे फैसले शामिल थे। लेकिन लगता है कि आदेशों का पालन करना यहां कुछ लोगों को अपनी “शान के खिलाफ” प्रतीत होता है।

नतीजा यह है कि प्रशासनिक अपील और निर्देश हवा में उड़ते नजर आ रहे हैं। बुधवार को दिनदहाड़े इसरी बाजार में ट्रक प्रवेश कर आराम से सामान उतारते दिखे। वहीं गिरिडीह रोड और वनांचल चौक के आसपास गुमटी, झुग्गी-झोपड़ी और अवैध कब्जों का साम्राज्य जस का तस कायम है। हालात ऐसे हैं कि सरकारी जमीन पर कब्जा कर उसे किराये पर चलाने का बाकायदा “लोकल बिजनेस मॉडल” विकसित हो चुका है। एक-एक व्यक्ति तीन से चार दुकानों से हर महीने दो से तीन हजार रुपये तक वसूली कर रहा है। कमोबेश यही स्थिति फुसरो रोड स्थित ओवरब्रिज के नीचे की सरकारी जमीन और एनएच-19 के फुटपाथों की भी है। फुटपाथों पर अतिक्रमण इस कदर है कि राहगीरों को मजबूरन मुख्य सड़क पर चलना पड़ता है, जहां हर पल दुर्घटना की आशंका बनी रहती है।

ऊपर से सर्विस रोड और फुटपाथ पर ईंट, बालू और छर्री गिराकर लोगों ने राह चलना और भी जोखिम भरा बना दिया है। इधर झारखंड एकता किसान मजदूर यूनियन के केंद्रीय अध्यक्ष गंगाधर महतो ने बताया कि सड़क किनारे बने फुटपाथों और सरकारी जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराने की मांग को लेकर उन्होंने एनएचएआई के पीडी, अनुमंडल प्रशासन, जिला प्रशासन तथा राज्य के वरीय अधिकारियों को कई बार पत्र भेजे हैं, लेकिन कार्रवाई अब तक “फाइलों की सैर” से आगे नहीं बढ़ पाई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर प्रशासनिक बैठकों और निर्देशों का पालन केवल कागजों तक ही सीमित रहा, तो फिर हादसों पर शोकसभा और मोमबत्ती जलाने की औपचारिकता ही बच जाएगी, जबकि सड़कें पहले की तरह खतरे से भरी रहेंगी।

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