"भीतर के दोष मिटाने से ही प्रशस्त होता है मोक्षमार्ग" :- मुनि प्रमाणसागर महाराज।
SHIKHAR DARPANFriday, May 15, 2026
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गिरीडीह,शिखर दर्पण संवाददाता।
गुणायतन परिसर में 1008 भगवान शांतिनाथ स्वामी का जन्म, तप एवं मोक्ष कल्याणक मनाया गया गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि जैन धर्म के सोलहवें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ स्वामी का जन्म, तप एवं मोक्ष कल्याणक के अवसर पर गुणायतन में प्रातः भगवान का अभिषेक एवं मुनि के मुखारविंद से शांतिमंत्रों के साथ शांतिधारा संपन्न हुई। तत्पश्चात संयुक्त रूप से निर्वाण लाडू समर्पित किया गया। प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया16 मई, शनिवार को गुरु नाम गुरु आचार्य ज्ञान सागर महाराज का समाधि दिवस है,अतः प्रातःमंगल बेला में मुनिसंघ सानिध्य में श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा। प्रातःकालीन धर्म सभा में मुनि प्रमाणसागर महाराज ने कहा “मोक्षमार्ग" बाहरी दुनिया को बदलने में नहीं, बल्कि अपने भीतर के दोषों को मिटाने से प्राप्त होगा” मुनि श्री ने कहा कि जब तक मनुष्य दूसरों के दोषों को देखता रहेगा, तब तक वह संसार के बंधनों में उलझा रहेगा। जिस दिन वह अपने दोषों, दुर्बलताओं और दुर्गुणों को पहचानकर उन्हें समाप्त करने का पुरुषार्थ प्रारंभ कर देगा, उसी दिन से मोक्षमार्ग प्रशस्त हो जाएगा।
उन्होंने कहा कि "मोक्ष" कोई बाहरी स्थान नहीं, बल्कि आत्मा की निर्मल अवस्था है। जब क्रोध, मान, माया, लोभ और समस्त विकार पूर्णतः शांत हो जाते हैं, तब आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाती है,और मुक्ति का मार्ग प्रारंभ हो जाता है। मुनि ने कहा कि भगवान शांतिनाथ स्वामी की शरण में जाने का उद्देश्य सांसारिक दुःखों से छुटकारा पाना या चमत्कार की अपेक्षा करना नहीं, बल्कि अपने भीतर के दोषों का क्षय करना होना चाहिए। उन्होंने कहा, कि प्रभु से प्राथना करो कि “हे प्रभु! आपकी प्रेरणा से मेरा अज्ञान दूर हो, मेरे दोष समाप्त हों और मेरा चित्त शांत हो जाए, क्योंकि जब तक भीतर के दोष समाप्त नहीं होते, तब तक सच्ची शांति और मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती।”उन्होंने कहा कि अशांति बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि हमारे भीतर पल रहे राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ और अपेक्षाओं से उत्पन्न होती है।
दोषों की शांति से ही आत्मा में शांति प्रकट होती है और यही धर्म का सार तथा साधना का वास्तविक उद्देश्य है।उदाहरण देते हुए मुनि श्री ने कहा कि एक शिष्य ने गुरु से पूछा — “मुझे शांति चाहिए।” गुरु ने मुस्कुराकर उत्तर दिया — “‘मुझे’ और ‘चाहिए’ हटा दो, शांति अपने आप आ जाएगी।” उन्होंने कहा कि जब “मैं” और “चाह” कम होने लगते हैं, तब भीतर स्वतः शांति का उदय होने लगता है। मुनि श्री ने दोषों से मुक्त होने के लिए चार बातों को जीवन में अपनाने का संदेश दिया — दोषों को जानना, दोषों को स्वीकारना, दोषों को सुधारना और दोषों को नष्ट करना। उन्होंने कहा कि श्री शांतिनाथ स्वामी ने सबसे पहले अपने भीतर के दोषों को समाप्त किया, तभी उनके दिव्य गुण प्रकट हुए। जब दोष नष्ट होते हैं, तब गुण स्वतः विकसित होने लगते हैं।