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"प्रमादपूर्वक या जान बूझकर किसी प्राणी के प्राणों का हनन करना ही वास्तविक हिंसा है" मुनि प्रमाण सागर।

पीरटांड,शिखर दर्पण संवाददाता।

गुणायतन में विराजमान मुनि प्रमाण सागर महाराज ने सांयकालीन शंकासमाधान कार्यक्रम में हिंसा और अहिंसा पर विस्तृत चर्चा करते हुये कहा कि सामान्यतः किसी जीव को मारना हिंसा की श्रेणी में आता है, परंतु जैन दर्शन इससे कहीं अधिक गहराई में जाकर हिंसा का विश्लेषण करता है। जैन शास्त्रों में कहा गया है कि हिंसा का मूल कारण केवल जीव की मृत्यु नहीं, बल्कि “प्रमाद” अर्थात असावधानी, राग-द्वेष और कषाययुक्त भाव   से किसी प्राणी के प्राणों का हनन करना ही वास्तविक हिंसा है"यदि मनुष्य सावधानी, करुणा और यत्नपूर्वक व्यवहार करता है, तो अनजाने में हुई द्रव्य हिंसा का दोष उतना नहीं माना जाता लेकिन जहाँ दुर्भाव, क्रोध, द्वेष, लापरवाही या मारने की भावना है, वह वास्तविक हिंसा की कोटी में आता है।

मुनि श्री ने डाकू, ड्राइवर और डॉक्टर का अत्यंत सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करते हुये कहा कि डाकू हत्या की भावना से गोली चलाता है। वहाँ भाव और द्रव्य हिंसा दोंनो है, इसलिए वह पूर्ण अपराधी है, वंही ड्राइवर के द्वारा दुर्घटना में किसी की मृत्यु हो जाती है,और यदि उसमें लापरवाही है तो उसको दोष लगेगा,अन्यथा नहीं।

वहीं डॉक्टर ऑपरेशन करते समय रोगी को बचाने की भावना रखता है,उसकी पूरी कोशिश के बाद भी यदि रोगी की मृत्यु हो जाती है,तो डॉक्टर को हत्यारा नहीं कहा जाता, क्योंकि वहाँ बचाने का भाव है, मारने का नहीं"यही जैन सिद्धांत का सार है कि केवल जीव की मृत्यु होना ही हिंसा नहीं, बल्कि हिंसा का वास्तविक कारण भीतर का अशुभ भाव है,जहाँ करुणा, सावधानी और यत्न है, वहाँ अहिंसा का तत्व है। इसीलिए जैन धर्म “यत्नाचार” पर विशेष बल देता है — कैसे चलें,बैठें, बोलें, खाएँ और व्यवहार करें — प्रत्येक कार्य सजगता एवं संवेदनशीलता के साथ हो।आचार्यों ने कहा है कि सावधानी पूर्वक चल रहे मुनि के पैरों के नीचे यदि कोई सूक्ष्म जीव मर जाए,तो भी उसे हिंसा का बंध नहीं होगा, क्योंकि वहाँ मारने का भाव नहीं है। इस प्रकार जैन धर्म की अहिंसा केवल बाहरी आचरण नहीं, बल्कि अंतःकरण की पवित्रता का नाम है। भगवान महावीर ने अहिंसा को केवल आदर्श रूप में ही नहीं, बल्कि जीवन की वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार भी समझाया है, उन्होंने अहिंसा को मुख्यतः दो स्तरों पर विभाजित किया— महाव्रत — जिसे मुनिराज अपनाते हैं, मुनि किसी भी प्रकार की हिंसा या प्रतिकार नहीं करते। यदि कोई उनके शरीर को कष्ट भी पहुँचाए, तब भी वे प्रतिकार नहीं करते, क्योंकि वे आत्मा को शरीर से भिन्न मानते हैं।

अणुव्रत — यह गृहस्थों के लिए व्यवहारिक अहिंसा है। गृहस्थ जीवन में पूर्ण रूप से हिंसा से बचना संभव नहीं, इसलिए सीमित और संयमित जीवन का मार्ग बताया गया है,गृहस्थों के लिए हिंसा के चार प्रकार बताए गए हैं—"संकल्पी हिंसा" जिसमें जानबूझकर, स्वार्थ, स्वाद, मनोरंजन या किसी उद्देश्य से जीवों की हिंसा करना यह अपराध है,तथा मांसाहार आदि इसी श्रेणी में आते हैं। इसका पूर्ण त्याग आवश्यक बताया गया है। "आरम्भी हिंसा" — दैनिक कार्यों जैसे चलना, खाना बनाना, स्नान करना आदि में होने वाली सूक्ष्म हिंसा। इससे पूर्ण बचाव कठिन है, इसलिए सावधानी रखने का निर्देश दिया गया। उद्योगी हिंसा — जीविका, व्यापार, खेती, नौकरी आदि में होने वाली हिंसा। इसे गृहस्थ के लिए परिस्थितिजन्य रूप में क्षम्य माना गया है, पर स्पष्ट कहा गया कि “हिंसा हो जाए तो अलग बात है, लेकिन हिंसा ही व्यवसाय न बन जाए।” विरोधी हिंसा — जब स्वयं, परिवार, समाज, धर्म, संस्कृति या राष्ट्र पर कोई आक्रमण हो, तब उसकी रक्षा हेतु किया गया प्रतिकार। इसे धर्मसम्मत माना गया है, क्योंकि इसमें आक्रामकता नहीं बल्कि रक्षा का भाव रहता है। इस प्रकार जैन दर्शन में अहिंसा का अर्थ कायरता नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, संयम और विवेकपूर्ण आचरण है। गृहस्थ के लिए यह शिक्षा दी गई कि वह क्रूरता, द्वेष और संकल्पपूर्वक हिंसा से बचे तथा जीवन में अधिक से अधिक करुणा और सावधानी अपनाए। उपरोक्त जानकारी गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने दी।

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