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सिद्धचक्र महामंडल विधान आत्मशुद्धि और कर्मनिर्जरा की महान आराधना :मुनि प्रमाणसागर।

पीरटांड,शिखर दर्पण संवाददाता। 

आगामी अष्ठानिका महापर्व (21 जुलाई से 29 जुलाई) के पावन अवसर पर शास्वत सिद्धक्षेत्र श्री सम्मेदशिखर तीर्थराज में मुनि प्रमाणसागर ससंघ के सानिध्य में 108 मंडलों के साथ संस्कृत भाषा में निबद्ध 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान का भव्य आयोजन किया जाएगा। यह विधान मुनि के मुखारविंद से संपन्न होगा। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि आषाढ़ अष्ठानिका का विशेष महत्व है, क्योंकि इसके पश्चात मुनिसंघ का चातुर्मास प्रारंभ होता है। इस दिव्य आयोजन में देश-विदेश से हजारों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए गुणायतन एवं सेवायतन परिवार द्वारा निःशुल्क आवास, भोजन एवं वस्त्र की विशेष व्यवस्था की जा रही है। शंकासमाधान कार्यक्रम में मुनि प्रमाणसागर ने सिद्धचक्र महामंडल विधान की महिमा बताते हुए कहा कि यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, पुण्यार्जन और कर्मनिर्जरा की महान आराधना है। उन्होंने कहा कि अन्य विधानों को सामान्य धार्मिक अनुष्ठान माना जा सकता है, लेकिन सिद्धचक्र महामंडल विधान को जीवनभर के पापों के प्रायश्चित स्वरूप स्वीकार किया गया है।

यह आत्मा की शुद्धि का प्रारंभ है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में कम से कम एक बार यह विधान अवश्य करना चाहिए। मुनिश्री ने कहा कि वास्तविक विधान वही है, जो विधिपूर्वक संस्कृत मंत्रों, बीजाक्षरयुक्त मंडल और पूर्ण श्रद्धा के साथ सम्पन्न हो। मंडल केवल द्रव्य चढ़ाने का स्थान नहीं, बल्कि साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र है। शास्त्रोक्त विधि से मंत्रोच्चार के साथ की गई आराधना से अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति का संचार होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सिद्धचक्र महामंडल विधान केवल लौकिक लाभ के लिए नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन भगवान की सच्ची आराधना से विघ्न-बाधाएं और अंतराय दूर होते हैं। धर्मानुष्ठान दुख-संकटों के निवारण का श्रेष्ठ माध्यम है और जिनेन्द्र आराधना में इस विधान को अत्यंत प्रभावशाली माना गया है।मुनि ने कहा कि संस्कृत मंत्रों का नौ-नौ बार उच्चारण आत्मा पर गहरा प्रभाव डालता है। यदि यह आराधना गुरु मुख से, पवित्र क्षेत्र में तथा अष्ठान्हिका जैसे मंगलमय काल में सम्पन्न हो, तो द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव — इन चारों मंगलों का अद्भुत संयोग बनता है।

उन्होंने कई उदाहरणों के माध्यम से इसकी प्रभावना बताते हुए कहा कि श्रद्धा और भक्ति से किए गए सिद्धचक्र महामंडल विधान से लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आए हैं। किसी परिवार की दुर्घटनाएं रुकीं, किसी व्यापारी को आर्थिक स्थिरता मिली तो किसी व्यक्ति को मानसिक तनाव से मुक्ति मिली। उन्होंने कहा कि इन उदाहरणों का उद्देश्य लोभ उत्पन्न करना नहीं, बल्कि यह बताना है कि भगवान की सच्ची आराधना से आत्मबल जागृत होता है।अंत में मुनि प्रमाणसागर ने श्रद्धालुओं से इस पुण्य आराधना में सहभागी बनने की प्रेरणा देते हुए कहा कि मंडल में स्थान मिले या न मिले, केवल मंडप में उपस्थित होकर भी इस महान आराधना का पुण्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है। श्रद्धा, भक्ति और समर्पण के साथ की गई आराधना जीवन में मंगल ही मंगल भर देती है।इस अवसर पर मुनि संधान सागर ने कार्यक्रम का संचालन किया। वहीं मुनि सार सागर, मुनि समादर सागर एवं मुनि रूप सागर की गरिमामयी उपस्थिति रही।

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