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"साधुओं के प्रति वात्सल्य भावना सोलह कारणों में प्रमुख" — आचार्य बसुनंदी।

पीरटांड,शिखर दर्पण संवाददाता।

'गुणायतन" में चल रहे पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महा महोत्सव के तीसरे दिवस “जन्म कल्याणक” के अवसर पर सम्मेद शिखरजी में पधारे आचार्य बसुनंदी जी, आचार्य बैराग्य नंदी जी एवं आचार्य ज्ञेय सागर जी का गुणायतन में पहुंचने पर मुनि प्रमाण सागर महाराज, मुनि संधान सागर महाराज सहित संघ ने मार्ग पर जाकर उनकी मंगल अगवानी की।इस अवसर पर आचार्य बसुनंदी जी महाराज ने अपने सम्वोधन में कहा कि साधुओं के प्रति वात्सल्य भाव सोलह कारण भावनाओं में प्रमुख है, “वात्सल्य अंग सदा जो ध्यावे, सो तीर्थंकर पदवी पावे” — यह भावना सीधे तीर्थंकर पद की प्रतिष्ठा का मार्ग प्रशस्त करती है। उन्होंने कहा कि पद बाहरी चीज है, जबकि वात्सल्य साधु जीवन की आत्मा है, जो हृदयों को जोड़ती है और भेद मिटाती है। उन्होंने स्मृतियों का उल्लेख करते हुए बताया कि वे परम पूज्य आचार्य विद्यासागर जी महाराज से अंतिम बार वर्ष 2022 में पपोरा जी में मिले थे।

इससे पूर्व 1990 में पथरिया, 1995 में पुनः तथा बाद में कई अवसरों पर उनके दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि साधु-साधुओं का यह मिलन देशभर के लिए विशेष संदेश है और इससे श्रावकों के परिणामों में निर्मलता आयेगी,जो मोक्षमार्ग को प्रशस्त करती है।आचार्य बसुनंदी जी ने गुणायतन में चल रहे निर्माण कार्य की सराहना करते हुए कहा कि मुनि प्रमाणसागर महाराज ने दूरदृष्टि के साथ हजारों वर्षों के लिए यह अद्वितीय कार्य किया है। सहस्त्रकूट जिनालय एवं पंच जिनालय की भव्य नक्काशी खजुराहो मंदिरों की याद दिलाती है। साधु-वस्तिका एवं श्रावकों के लिए बनाए जा रहे स्थानों की भी उन्होंने मुक्तकंठ से प्रशंसा की। आचार्य ज्ञेय सागर जी महाराज ने कहा कि जन्मकल्याणक का दिवस अत्यंत पुण्यमय है, उन्होंने सिंगापुर एवं मलेशिया से आए श्रावकों से जीवन परिवर्तन के लिये छोटे-छोटे नियम लेने का आग्रह किया और बताया कि यही नियम जीवन में बहूत बड़ा परिवर्तन लाते हैं। मुनि प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि जन्मकल्याणक के साथ निर्ग्रंथ आचार्यों एवं साधु संघ के दर्शन का अवसर मिलना अत्यंत ही सौभाग्य की बात है।

उन्होंने सभी से आग्रह किया कि हृदय में देव-शास्त्र-गुरु के प्रति भक्ति और साधुओं में गुण देखने की दृष्टि बनाए रखें, यही जीवन की सफलता है।कार्यक्रम में संघस्थ मुनि संधान सागर, सार सागर, समादरसागर एवं रूप सागर महाराज ने भी वंदना कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। संचालन ब्रह्मचारी अशोक भैया एवं अभय भैया ने किया। गुणायतन मध्यभारत के प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि तीसरे दिवस प्रातः 7 बजे भगवान का जन्मकल्याणक मनाया गया। सौधर्म इंद्र का सिंहासन कम्पायमान होने एवं इंद्र-इंद्राणी संवाद का मंचन किया गया। आयोध्यानगरी (गुणायतन) में माता मरुदेवी की कुक्षि से त्रिलोकनाथ के जन्म की घोषणा के साथ उत्सव मनाया गया तथा भव्य जुलूस की तैयारियां प्रारंभ हुईं।उन्होंने बताया कि 30 अप्रैल को भगवान का दीक्षा कल्याणक तथा 1 मई को प्रातः वृहद शांति मंत्रों के साथ 55 मिनट की शांतिधारा, मुनि वृषभ सागर की आहार चर्या एवं दोपहर पश्चात ज्ञान कल्याणक की क्रियाएं संपन्न होंगी।

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