संयमित और सार्थक वाणी ही साधना का आधार : मुनि श्री प्रमाणसागर।
SHIKHAR DARPANWednesday, April 22, 2026
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गिरिडीह,शिखर दर्पण संवाददाता।
गुणायतन प्रणेता मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने प्रातःकालीन धर्मसभा में वाणी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “वाणी का मूल्य तभी है, जब वह संयमित, सार्थक और सर्वहितकारी हो।” उन्होंने कहा कि बिना सोचे-समझे बोलना व्यक्ति के व्यक्तित्व पर बोझ बन जाता है और उसके प्रयासों को भी कलंकित कर देता है। मुनि श्री ने कहा कि वाणी का अतिरेक भ्रम पैदा करता है, संबंधों को बिगाड़ता है और मन की शांति छीन लेता है। इसलिए साधक के लिए मितभाषिता एक महत्वपूर्ण गुण है और आवश्यकता पड़ने पर मौन भी साधना का रूप है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि सोच-समझकर, कम और सार्थक बोलना ही वाणी की पवित्रता है। उन्होंने कहा कि केवल सुनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सुनने के साथ चिंतन, मनन और आचरण भी आवश्यक है।
भगवान महावीर के संदेश को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि जो सुना है उसे परखकर ही जीवन में अपनाना चाहिए, ताकि व्यक्ति सही और गलत का विवेक कर सके। मुनि श्री ने यह भी कहा कि सच्चा धर्म तभी है, जब ज्ञान व्यवहार में उतरे। धर्म को जानकर उसमें प्रवृत्ति करना और अधर्म से निवृत्ति लेना ही सच्चे साधक की पहचान है। उन्होंने कहा कि पाप से भय और धर्म से प्रेम ही साधना का प्रारंभ है, जो आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। इस अवसर पर तीर्थंकर अभिनंदननाथ भगवान के मोक्ष कल्याणक के अवसर पर श्रावकों ने मोक्ष स्थल पर जाकर निर्वाण लाड़ू अर्पित किया। गुणायतन परिसर में प्रातः अभिषेक, शांतिधारा एवं विशेष पूजन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का संचालन बाल ब्रह्मचारी अशोक भैया एवं अभय भैया ने किया। गुणायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि 27 अप्रैल से 2 मई तक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव का आयोजन किया जाएगा, जिसमें सिंगापुर जाने वाली प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा की जाएगी।