अक्षय तृतीया पर मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज सहित नवदीक्षित तीनों मुनिराजों की प्रथम आहार-चर्या सम्पन्न।
SHIKHAR DARPANSunday, April 19, 2026
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गिरीडीह,शिखर दर्पण संवाददाता।
“अक्षय तृतीया” जैन श्रमण संस्कृति के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण दिवस माना जाता है। इसी दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने लगभग एक वर्ष तेरह दिन के दीर्घ उपवास के पश्चात इच्छुरस से आहार ग्रहण किया था। यह सौभाग्य राजा श्रेयांस एवं उनके भाई राजा सोम को प्राप्त हुआ था, इसलिए यह दिवस “दान तीर्थ” के रूप में भी प्रसिद्ध है। गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि तीर्थराज श्री सम्मेदशिखर स्थित गुणायतन तीर्थ में विराजमान संत शिरोमणि आचार्य गुरुदेव विद्यासागर जी महामुनिराज के परम प्रभावक शिष्य, गुणायतन एवं विद्या प्रमाण गुरुकुलम के प्रणेता मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज, मुनि श्री संधान सागर महाराज सहित नवदीक्षित मुनिराज—मुनि श्री समादर सागर, मुनि श्री सार सागर एवं मुनि श्री रूप सागर महाराज की प्रथम आहार-चर्या अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर सम्पन्न हुई।आहार-चर्या का शुभारंभ श्रावक शिरोमणि अशोक पाटनी, सुशीला पाटनी तथा देश-विदेश एवं भारत के विभिन्न नगरों से पधारे श्रद्धालु श्रावक-श्राविकाओं द्वारा किया गया। मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज की आहार-चर्या अशोक पाटनी (आर.के. मार्बल परिवार) के यहां सम्पन्न हुई।
इस अवसर पर मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने अक्षय तृतीया का महत्व बताते हुए कहा कि दान तीर्थ से ही धर्म तीर्थ की शुरुआत होती है। जो व्यक्ति देना नहीं जानता, वह धर्म सीख ही नहीं सकता। आचार्य गुरुदेव कहा करते थे—गृहस्थ की शोभा दान से है, दान दुर्गति का विनाश करता है। इसलिए जो अपने जीवन को सुरक्षित और सार्थक बनाना चाहते हैं, उन्हें दान अवश्य करना चाहिए। मुनि श्री ने दान के चार सूत्र बताते हुए कहा—दान किसको, कितना, क्यों और कब? उन्होंने कहा कि कुछ लोग नाम-यश के लिए दान करते हैं, कुछ धनवृद्धि की भावना से, कुछ करुणा से, कुछ पुण्य भाव से तथा कुछ पवित्रता के लिए दान देते हैं। मुनि श्री ने कहा—धन कमाओ और खूब कमाओ, लेकिन न्याय-नीति और प्रमाणिकता से कमाओ। लक्ष्मी सबको प्रिय है, परंतु धन के साथ जुड़े दोषों के प्रक्षालन के लिए दान आवश्यक है। जैसे स्नान से शरीर की मलिनता दूर होती है, वैसे ही दान से अंत:करण की पवित्रता बढ़ती है, धन के प्रति आसक्ति घटती है और उदारता का विकास होता है।
उन्होंने कहा कि नाम-यश की चाह या व्यापारिक बुद्धि से दान नहीं देना चाहिए। पुनीत कर्म मानकर उत्साहपूर्वक दिया गया दान जीवन का उत्कर्ष करता है। केवल धन जोड़ने से लाभ नहीं, जितनी तत्परता से जोड़ते हो उतनी ही तत्परता से लगाने का भाव भी होना चाहिए। मुनि श्री ने आचार्य गुरुदेव से जुड़ा अमरकंटक का एक प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक व्यक्ति भारी कर्ज और निराशा में आत्महत्या का विचार लेकर आया था। आचार्य श्री ने उससे थोड़ी राशि दान करवाई। बाद में संयोग से उसे व्यापार में अवसर मिला और वह धीरे-धीरे उन्नति कर सुदृढ़ स्थिति में पहुंच गया। यह घटना इस तथ्य को सिद्ध करती है कि दान दुर्गति का नाश कर जीवन में सुगति का मार्ग खोलता है।आहार-चर्या सम्पन्न कराने में बाल ब्रह्मचारी अशोक भैया, अभय भैया सहित अनेक त्यागी वृत्ति श्रावकों ने पंच ऋषिराजों को श्रद्धापूर्वक आहार प्रदान किया।