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धर्म की क्रियाओं से अधिक धर्म के मर्म पर दें जोर: राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज।

मधुबन,शिखर दर्पण संवाददाता। 

गुणायतन, मधुबन में आयोजित शंका समाधान कार्यक्रम में राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने देश-विदेश से आए श्रावकों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझाया। उन्होंने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ और धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र ही धर्म का वास्तविक स्वरूप है। जीवन में अधर्म से बचना ही सच्चे धर्म की शुरुआत है। महाराज श्री ने कहा कि धार्मिक क्रियाएं किसी परिस्थिति में संभव नहीं हो पाने पर निराश होने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन अपने आचरण को अधर्म से बचाना जरूरी है। गुरु के प्रत्यक्ष सान्निध्य में पहुंचना संभव न हो तो वर्चुअल माध्यम से प्रवचन सुनकर भी लाभ लिया जा सकता है। उन्होंने प्रतिदिन णमोकार महामंत्र का जाप करने और कम से कम 15 मिनट गुरु के प्रवचन सुनने की सलाह दी। संकल्प के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि संकल्प व्यक्ति को लक्ष्य के प्रति दृढ़ बनाता है और जीवन में अनुशासन विकसित करता है।

सच्ची भक्ति का अर्थ केवल आराध्य की पूजा करना नहीं, बल्कि उनके गुणों को अपने जीवन में अपनाना भी है। सही-गलत के बीच निर्णय लेने में दुविधा होने पर शांत मन से आत्मचिंतन और विवेक के आधार पर निर्णय लेना चाहिए। युवा पीढ़ी और बुजुर्गों के बीच बढ़ते वैचारिक मतभेदों पर उन्होंने कहा कि विचारों में भिन्नता स्वाभाविक है, लेकिन विचारों का टकराव तनाव पैदा करता है। नई पीढ़ी पर अपनी सोच थोपने के बजाय उसकी परिस्थितियों को समझना और उचित मार्गदर्शन देना जरूरी है। जैन दर्शन का अनेकांतवाद भी दूसरों के दृष्टिकोण को समझने की प्रेरणा देता है। मोबाइल और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग पर चिंता जताते हुए महाराज श्री ने तकनीक का विवेकपूर्ण और संयमित उपयोग करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि तकनीक जीवन को बेहतर बनाने का साधन बने, न कि दिनचर्या और व्यवहार को नियंत्रित करने का माध्यम। कार्यक्रम का मुख्य संदेश श्रद्धा, संकल्प, विवेक और संयम को जीवन में अपनाकर अपने आचरण को बेहतर बनाना रहा।

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