श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का उद्देश्य जीवन में आत्मपरिवर्तन लाना है" — राष्ट्रसंत मुनि प्रमाण सागर महाराज।
SHIKHAR DARPANWednesday, July 22, 2026
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मधुबन,शिखर दर्पण संवाददाता।
जैनियों के विश्व प्रसिद्ध तीर्थ स्थल मधुबन स्थित गुणायतन के विशाल परिसर में राष्ट्रसंत मुनि प्रमाण सागर महाराज एवं मुनि संधान सागर महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में आयोजित नौ दिवसीय सिद्धचक्र महामंडल विधान श्रद्धा और भक्ति के अनुपम वातावरण में क्रमशः आगे बढ़ रहा है। मुख्य जनसंपर्क अधिकारी वीरेंद्र जैन छाबड़ा (कोडरमा) ने बताया कि 320×160 फीट के विशाल विधान मंडप में एक साथ 108 मंडलों में श्रीजी विराजमान हैं। देश-विदेश से आए हजारों श्रद्धालु विशुद्ध भाव से भगवान की आराधना करते हुए 16 अर्घ समर्पित कर चुके हैं। विधान के तीसरे दिवस गुरुवार को 32 अर्घ समर्पित किए जाएंगे। इस अवसर पर राष्ट्रसंत मुनि प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि सिद्धचक्र महामंडल विधान का वास्तविक उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न करना नहीं, बल्कि जीवन में आत्मपरिवर्तन लाना है। यदि विधान के पश्चात हमारी भाषा, व्यवहार, भावनाएँ और दृष्टिकोण बदल जाएँ, तभी यह आराधना सार्थक कही जाएगी।उन्होंने कहा कि भगवान की पूजा केवल मुख या शब्दों की नहीं, बल्कि भावों की पूजा होनी चाहिए। केवल मंत्रोच्चारण जीवन नहीं बदलता, बल्कि हृदय की सच्ची श्रद्धा और भावपूर्ण समर्पण ही मनुष्य के जीवन में अमूल्य परिवर्तन लाता है।
इसलिए पूजा के समय स्वयं को भूलकर पूर्ण समर्पण भाव से भगवान की आराधना करनी चाहिए।मुनि ने कहा सिद्धचक्र महामंडल विधान नौ पदों की आराधना का महान विधान है,जिसमें पंच परमेष्ठी,सम्यग्दर्शनसम्यग्ज्ञान,सम्यक्चरित्र एवं सम्यक् तप का गहन आध्यात्मिक संदेश निहित है। इन सिद्धांतों को केवल सुनना नहीं, बल्कि जीवन में आत्मसात करना ही सच्ची साधना है। उन्होंने कहा कि यदि इस विधान के बाद हमारा अहंकार घटे, क्रोध शांत हो, लोभ एवं स्वार्थ कम हों तथा जीवन में शांति, सरलता और समता का विकास हो, तभी विधान सफल माना जाएगा। केवल मंडप में भक्ति करके बाहर निकलते ही पुराने स्वभाव में लौट जाना आराधना का उद्देश्य नहीं है।मुनिश्री ने श्रद्धा से सिद्धि तक की आध्यात्मिक यात्रा को स्पष्ट करते हुए कहा कि "श्रद्धा से भावना उत्पन्न होती है, भावना आराधना में बदलती है, आराधना साधना बनती है और साधना अंततः सिद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है।" शुद्ध भावना से सम्पन्न आराधना ही आत्मकल्याण और जीवन-परिवर्तन का आधार बनती है।उन्होंने श्रद्धालुओं के उत्साह की सराहना करते हुए कहा कि सब कुछ छोड़कर बड़ी संख्या में विधान में सम्मिलित होना उनकी उत्कृष्ट श्रद्धा और भक्ति का प्रमाण है।आवश्यकता इस बात की है कि यह भावना केवल नौ दिनों तक सीमित न रहे, बल्कि जीवनभर की साधना बन जाए।अष्टान्हिका पर्व का उल्लेख करते हुए मुनिश्री ने कहा कि नन्दीश्वर द्वीप में देवगण आठों दिन निरंतर जिनेन्द्र भगवान की आराधना करते हैं।
आज विधान मंडप में उमड़ रही भक्तिभावना को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो वही दिव्य वातावरण यहाँ साकार हो उठा हो। भले ही हम नन्दीश्वर द्वीप प्रत्यक्ष न जा सकें, किंतु उसे अपने हृदय में अवश्य बसाएँ।उन्होंने कहा कि साधारण जीवन को असाधारण बनाने की शक्ति भक्ति में निहित है। यदि हमारी भक्ति गहरी होगी तो हमारा जीवन भी साधारण से असाधारण बन जाएगा। आराधना केवल हाथों से नहीं, बल्कि अंतर्मन से की जानी चाहिए।मुनिश्री ने साधकों को चार महत्वपूर्ण सूत्र— भावना, आराधना,साधना औरसिद्धि— बताते हुए कहा किपहले अंतर्मन में श्रद्धा और भावना विकसित करें।वही आगे चलकर आराधना और फिर साधना का रूप लेती है। साधक को अपने भावों की निरंतरता बनाए रखनी चाहिए, क्योंकि आरंभिक उत्साह के बाद भावों का शिथिल पड़ जाना आध्यात्मिक कमजोरी का संकेत है।जैन पूजा में इन्द्र-इन्द्राणी के स्वरूप का विवेचन करते हुए उन्होंने कहा कि धार्मिक दृष्टि से इसका संदेश है कि देवता भी जिनेन्द्र भगवान की आराधना करते हैं और मनुष्य पूजा के माध्यम से स्वयं पूज्य बनने की दिशा में अग्रसर हो सकता है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से इसका अर्थ है कि पूजा के समय मनुष्य देह, संसार और भौतिक चिंताओं से ऊपर उठकर पूर्ण एकाग्रता के साथ भगवान की भक्ति करे।मुनिश्री ने स्पष्ट किया कि अनेक विधान देवों द्वारा सम्पन्न माने जाते हैं, किंतु श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान मनुष्य की साधना का विधान है। इसमें केवल भक्ति नहीं, बल्कि भक्ति के साथ आराधना और आराधना के साथ कठोर साधना जुड़ी हुई है। अष्टान्हिका पर्व आत्मशुद्धि का विशेष अवसर है। साधकों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार संयम, उपवास, एकासन तथा तप के विविध रूप अपनाकर इन दिनों को आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम बनाना चाहिए।अंत में मुनि ने सभी मंडलधारकों एवं श्रद्धालुओं को मंगलाशीष प्रदान करते हुए कहा कि प्रत्येक धार्मिक क्रिया भावपूर्वक करें, क्योंकि "भाव के बिना क्रिया फलवती नहीं होती।" उन्होंने सभी से आह्वान किया कि सिद्धचक्र महामंडल विधान को केवल धार्मिक आयोजन न मानकर आत्मपरिवर्तन, आत्मशुद्धि और सिद्धि की ओर बढ़ने का महापर्व बनाएं।