कुदरत का कानून कभी अंधा नहीं हो सकता" -मुनि प्रमाण सागर।
SHIKHAR DARPANThursday, June 18, 2026
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गिरिडीह,शिखर दर्पण संवाददाता।
"कहते हैं कानून अंधा होता है, तुम्हारा कानून अंधा हो सकता है, लेकिन कुदरत का कानून कभी अंधा नहीं हो सकता।" यह प्रेरणादायी उद्गार पूज्य मुनि प्रमाण सागर जी महाराज ने गुणायतन, श्री सम्मेदशिखर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि संसार के कानूनों में त्रुटियाँ हो सकती हैं, उनसे बचने के उपाय खोजे जा सकते हैं, किन्तु प्रकृति और कर्म का विधान अत्यंत सूक्ष्म, निष्पक्ष तथा अचूक होता है। वहाँ किसी प्रकार का पक्षपात, छल अथवा बचाव संभव नहीं है। मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य अपनी चतुराई, धन, प्रभाव या अन्य साधनों के बल पर कभी-कभी सांसारिक न्याय व्यवस्था को भ्रमित कर सकता है, कानून की आँखों में धूल झोंक सकता है, किन्तु कुदरत की आँखों में धूल झोंकना किसी के लिए भी संभव नहीं है। कर्मों का लेखा-जोखा अत्यंत सूक्ष्मता से संचालित होता है और प्रत्येक व्यक्ति को अपने शुभ एवं अशुभ कर्मों का फल अवश्य प्राप्त होता है। इसलिए जीवन में ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए, जिसके कारण भविष्य में दुःख, पश्चाताप या कष्ट का सामना करना पड़े।
उन्होंने कहा कि आज अधिकांश लोग तात्कालिक लाभ, स्वार्थ और भौतिक उपलब्धियों के पीछे भागते हुए यह भूल जाते हैं कि प्रत्येक कर्म का परिणाम निश्चित है। यदि हम किसी को पीड़ा पहुँचाते हैं, किसी के अधिकारों का हनन करते हैं, छल-कपट, बेईमानी अथवा अन्याय का सहारा लेते हैं, तो उसका प्रतिफल किसी न किसी रूप में अवश्य भोगना पड़ता है। वहीं दया, सेवा, त्याग, परोपकार और धर्म के कार्य कभी निष्फल नहीं जाते। उनका शुभ परिणाम व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और आत्मिक उन्नति के रूप में सामने आता है। मुनि श्री ने कहा कि जीवन का उद्देश्य केवल धन, पद और प्रतिष्ठा अर्जित करना नहीं है, बल्कि अपने भीतर सद्गुणों का विकास करना है। उन्होंने कहा कि मनुष्य इस संसार में मुट्ठी बाँधकर आता है और जाते समय उसके हाथ खाली दिखाई देते हैं, किन्तु वास्तव में वह अपने साथ अपने कर्मों की पूँजी लेकर जाता है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा— "मुट्ठी बाँधकर आया हूँ, झोली भरकर जाना है।" यह झोली किसी भौतिक वस्तु की नहीं, बल्कि सत्कर्मों, पुण्य, सदाचार, संयम, सेवा और धर्म की झोली है।
अपने प्रवचन में मुनि श्री ने कहा कि यदि व्यक्ति प्रतिदिन कुछ समय आत्मचिंतन, आत्मनिरीक्षण और धर्म साधना के लिए निकाले, तो उसका जीवन सार्थक बन सकता है। दूसरों की कमियाँ देखने के बजाय स्वयं को सुधारने का प्रयास करना चाहिए। मन, वचन और काया की पवित्रता ही वास्तविक धर्म है। व्यक्ति जितना अपने अंतःकरण को निर्मल बनाता है, उतना ही वह आध्यात्मिक रूप से समृद्ध होता जाता है। उन्होंने आगे कहा कि संसार की संपत्ति, वैभव और भौतिक उपलब्धियाँ यहीं छूट जाती हैं, लेकिन पुण्य और सत्कर्म आत्मा के साथ चलते हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में ऐसा आचरण अपनाना चाहिए जिससे उसका अंतरंग पुण्य से भरता जाए। यही वास्तविक कमाई है, यही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है और यही आत्मकल्याण का मार्ग है। धर्मसभा में बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने मुनि श्री के प्रेरणादायी उद्बोधन को गंभीरता से श्रवण कर अपने जीवन में सदाचार, परमार्थ, मैत्री, विश्वास और धर्ममय आचरण को अपनाने का संकल्प लिया।