"स्वयं को जानोगे,तो मृत्यु का भय स्वयं ही समाप्त हो जाएगा।”मुनि प्रमाणसागर।
SHIKHAR DARPANWednesday, May 06, 2026
0
पीरटांड,शिखर दर्पण संवाददाता।
"मनुष्य जीवन बहूत अनमोल है, किंतु इसकी सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मनुष्य स्वयं को ही नहीं पहचान पाता। जब तक व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप से अनभिज्ञ रहता है, तब तक उसका जीवन भ्रम, भय और मोह में उलझा रहता है" उपरोक्त उदगार मुनि प्रमाणसागर महाराज ने गुणायतन परिसर में आयोजित सांयकालीन शंकासमाधान में "मत्यु से भय क्यों लगता है"? प्रश्न के उत्तर में व्यक्त किये। मुनि ने कहा कि आध्यात्मिक दृष्टि से विचार करें तो मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी भूल यही है, कि वह जिंदगी निकल जाती है,और वह अपने आप को नहीं पहचानता, उन्होंने कहा कि हम अपने आपको शरीर, नाम, पद और संबंधों से जोड़ लेते हैं, जबकि ये सब परिवर्तनशील हैं। वास्तविकता यह है कि “मैं” इन सबसे परे हुं। जब तक यह अंतर स्पष्ट नहीं होता, तब तक जीवन में अस्थिरता और भय बना रहता है।"मृत्यु का भय"भी इसी अज्ञानता का परिणाम है। व्यक्ति सोचता है कि मृत्यु उसके अस्तित्व का अंत है, जबकि सत्य यह है कि मृत्यु केवल शरीर का परिवर्तन है। आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है — वह शाश्वत, अविनाशी और अजर-अमर है। शरीर नश्वर है,उसका नाश निश्चित है,किंतु आत्मा सदैव विद्यमान रहती है।
जब मनुष्य आत्मा के स्वरूप को समझ लेता है, तब उसकी दृष्टि बदल जाती है। और उसे अनुभव होता है कि वह शरीर नहीं, बल्कि चेतन सत्ता है। यही अनुभव उसे जन्म-मरण के भय से मुक्त करता है। तब मृत्यु एक भया वह घटना न होकर एक स्वाभाविक परिवर्तन प्रतीत होती है।जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए धारण करता है, वैसे ही आत्मा भी एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। इस सत्य को जान लेने के बाद मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है, और जीवन में स्थिरता एवं शांति का अनुभव होने लगती है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने जीवन का कुछ समय आत्मचिंतन में लगाए। स्वयं से प्रश्न करे — मैं कौन हूँ? मेरा वास्तविक स्वरूप क्या है? में कंहा से आया हूँ और मुझे कंहा जाना है? मुनि ने कहा कि इन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर में जीवन का वास्तविक सार छिपा है।" उन्होंने कहा कि"आत्मज्ञान" ही वह प्रकाश है,जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है,और मनुष्य को भय मुक्त, शांत और संतुलित जीवन जीने की ओर अग्रसर करता है। इसी क्रम में मुनि ने परिवार की एक जुटता का समाधान देते हुये कहा कि परिवार के सभी सदस्यों में अपनत्व,आदर, सहयोग और सहनशीलता होंना आवश्यक है,"परिवार" समाज की मूल इकाई है और उसकी एकजुटता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति होती है।
वर्तमान समय में बदलती जीवनशैली और बढ़ती व्यस्तताओं के कारण पारिवारिक संबंधों में दूरी देखी जा रही है। ऐसे में परिवार को एकजुट बनाए रखने के लिए कुछ मूलभूत मूल्यों को अपनाना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि परिवार के प्रत्येक सदस्य के मन में अपनत्व की भावना का विकास होना चाहिए। जब हर व्यक्ति यह अनुभव करता है कि “यह मेरा परिवार है और सभी सदस्य मेरे अपने हैं,” तब आपसी संबंध मजबूत होते हैं और एकता स्वतः बढ़ती है, मुनि ने कहा परस्पर आदर का भाव अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक-दूसरे का सम्मान करने से प्रेम और विश्वास का वातावरण बनता है। इसके विपरीत, उपेक्षा और तिरस्कार से संबंधों में दूरियाँ बढ़ती हैं और अपनत्व कमजोर पड़ता है, उन्होंने कहा कि सहयोग की भावना ही परिवार की एकजुटता का आधार है। यदि किसी एक सदस्य को कोई समस्या होती है, तो अन्य सभी सदस्यों को उसके समाधान के लिए तत्पर रहना चाहिए। जिस प्रकार शरीर का एक अंग पीड़ित होता है तो पूरा शरीर उसकी सहायता करता है,उसी प्रकार परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे के सहयोगी बनें। मुनि ने कहा कि सहनशीलता के साथ नजर अंदाज करने की क्षमता भी आवश्यक है। छोटी-छोटी बातों को तूल देने के बजाय उन्हें समझदारी से नजरअंदाज करना चाहिए। इससे अनावश्यक विवादों से बचा जा सकता है और पारिवारिक वातावरण सौहार्दपूर्ण बना रहता है। मुनि श्री ने कहा यदि परिवार में अपनत्व, आदर, सहयोग और सहनशीलता जैसे मूल्यों को अपनाया जाए, तो एकजुटता स्वतः सुदृढ़ होगी और परिवार सुख-शांति तथा सामंजस्य का केंद्र बन जाऐगा उपरोक्त जानकारी देते हुये राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया प्रतिदिन श्रद्धालुओं का आना लगा हुआ है,मुनि धार्मिक समस्याओं के साथ सामाजिक एवं पारिवारिक समस्याओं का समाधान कर सामाजिक विषमताओं को दूर कर हमेशा सकारात्मक संदेश प्रदान करते है।