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अंतर चेतना के जागरण से प्रकट होता है वास्तविक आत्मविश्वास : मुनिश्री प्रमाणसागर।

गिरीडीह,शिखर दर्पण संवाददाता।

“आज की भाषा में जिसे लोग ‘सेल्फ कॉन्फिडेंस’ कहते हैं, उसका वास्तविक स्वरूप केवल मनोबल नहीं, बल्कि आत्मा के प्रति जागृत विश्वास है। सच्चा आत्मविश्वास अंतर चेतना के जागरण से प्रकट होता है।”यह प्रेरणादायी उद्गार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने शंकासमाधान कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए।उन्होंने कहा कि सामान्य रूप से लोग आत्मविश्वास को मानसिक दृढ़ता और साहस से जोड़कर देखते हैं। निश्चित रूप से जिसका मनोबल मजबूत होता है, वह अधिक आत्मविश्वासी दिखाई देता है, लेकिन आत्मविश्वास का वास्तविक अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा और आध्यात्मिक है। मुनिश्री ने स्पष्ट किया कि आत्मविश्वास का वास्तविक अर्थ है — “आत्मा पर विश्वास।” यह केवल मानसिक शक्ति से नहीं, बल्कि अंतर चेतना के जागरण से उत्पन्न होता है।उन्होंने जैन साधना का उल्लेख करते हुए कहा कि यही अवस्था सम्यक दर्शन कहलाती है, जो मोहग्रंथि के भेदन से प्रकट होती है। जब व्यक्ति की चेतना जागृत होती है, तब उसके भीतर वास्तविक आत्मविश्वास जन्म लेता है।

ऐसे व्यक्ति को यह अनुभव हो जाता है कि “मैं अजर, अमर और अविनाशी आत्मा हूँ, इसलिए भय, शंका और विपत्ति मुझे विचलित नहीं कर सकती।”मुनिश्री ने कहा कि सामान्य व्यक्ति का आत्मविश्वास परिस्थितियों और नकारात्मक विचारों से डगमगा जाता है, लेकिन आत्मस्वरूप को पहचानने वाला व्यक्ति हर परिस्थिति में स्थिर और शांत बना रहता है। उन्होंने आत्मविश्वास को दो भागों — व्यवहारिक और आध्यात्मिक — में विभाजित करते हुए कहा कि व्यवहारिक आत्मविश्वास परिस्थितियों से प्रभावित हो सकता है, जबकि आध्यात्मिक आत्मविश्वास स्थायी और अटल होता है।उन्होंने लोगों को प्रेरित करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अंतर चेतना को जागृत करने का प्रयास करना चाहिए। आत्मविश्वास के बल पर मनुष्य न केवल अपने जीवन को ऊँचा उठा सकता है, बल्कि आत्मकल्याण के मार्ग पर भी आगे बढ़ सकता है।इसी क्रम में मुनिश्री प्रमाणसागर ने क्रोध नियंत्रण पर भी विस्तार से मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि आत्मचिंतन, प्रतिक्रमण और भावनायोग क्रोध को नियंत्रित करने के प्रभावी उपाय हैं।

क्रोध मानव जीवन की स्वाभाविक भावना है, लेकिन अनियंत्रित क्रोध व्यक्ति और उसके संबंधों के लिए अत्यंत नुकसानदायक सिद्ध होता है।उन्होंने कहा कि क्रोध को नियंत्रित करने के लिए सबसे पहले मन में यह जागरूकता लानी होगी कि “मुझे क्रोध नहीं करना है।” यदि क्रोध उत्पन्न हो जाए तो तुरंत पश्चाताप करना चाहिए तथा संभव हो तो संबंधित व्यक्ति से क्षमा याचना करनी चाहिए। मन में क्षमा और शांति का भाव बनाए रखना आवश्यक है।मुनिश्री ने कहा कि व्यक्ति को निरंतर स्वयं को यह स्मरण कराना चाहिए कि “मुझे शांत और संयमित रहना है।” सकारात्मक चिंतन और प्रार्थना के नियमित अभ्यास से व्यक्ति के भीतर शांति, संयम और आत्मबल का विकास होता है। उन्होंने प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और क्षमायाचना को आत्ममूल्यांकन और व्यवहार सुधार की महत्वपूर्ण प्रक्रियाएँ बताया।उन्होंने कहा कि क्रोध के समय विवेक कमजोर पड़ जाता है, इसलिए शांत अवस्था में नियमित अभ्यास करना जरूरी है। निरंतर साधना और सजगता से व्यक्ति धीरे-धीरे क्रोध पर नियंत्रण पाने में सफल हो सकता है।

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