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बदलाव को स्वीकारें, भटकाव से बचें : बच्चों को संस्कारों से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता — मुनि प्रमाणसागर महाराज।

पीरटांड,शिखर दर्पण संवाददाता।  

“बच्चों को पढ़ाना-लिखाना आज की आवश्यकता है, लेकिन पढ़ाई-लिखाई के साथ जो भटकाव बढ़ रहा है, वह हमारी संस्कृति के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है।” यह बातें मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने सांयकालीन शंकासमाधान कार्यक्रम में कही। मुनि श्री ने कहा कि युवाओं के भटकाव का मुख्य कारण कम उम्र में को-एजुकेशन, मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव हैं। आज बच्चे अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने लगे हैं और माता-पिता की भूमिका केवल सहमति तक सीमित होती जा रही है। उन्होंने कहा कि पिछले 20-25 वर्षों में समाज में तेजी से परिवर्तन आया है और 5G के बाद की पीढ़ी की सोच पूरी तरह बदल चुकी है। बदलाव को स्वीकार करना जरूरी है, लेकिन यदि शाश्वत मूल्यों को छोड़ दिया जाए तो वही बदलाव भटकाव बन जाता है। मुनि श्री ने परिवार व्यवस्था पर चिंता जताते हुए कहा कि आर्थिक आत्मनिर्भरता और “लिव-इन रिलेशन” जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ती सामाजिक व कानूनी स्वीकृति से रिश्तों में समायोजन और सहनशीलता कम हो रही है। इसका असर परिवार और सामाजिक व्यवस्था पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।

उन्होंने कहा कि आज अंग्रेज़ी माध्यम की शिक्षा के कारण बच्चे भारतीय भाषाओं, संस्कृति और परंपराओं से दूर होते जा रहे हैं। ऐसे समय में बच्चों को धर्म, संस्कार और गुरुजनों से जोड़ना बेहद आवश्यक है। उन्होंने अभिभावकों से आग्रह किया कि बच्चों को बचपन से ही पाठशालाओं और धार्मिक गतिविधियों से जोड़ें। मुनि श्री ने कहा, “बदलाव को स्वीकारें और भटकाव से बचें।” उन्होंने कहा कि पाठशाला केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण की आधारशिला है। धार्मिक और नैतिक संस्कार बच्चों को कुसंगति और दुर्व्यसनों से बचाकर सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने कहा कि जिन बच्चों के जीवन में बचपन से संस्कारों का बीज बो दिया जाता है, वे विपरीत परिस्थितियों में भी अपने मार्ग से विचलित नहीं होते। अंत में उन्होंने अभिभावकों से बच्चों को धार्मिक पाठशालाओं से जोड़ने का आह्वान किया, ताकि आने वाली पीढ़ी संस्कारित, संयमी और सदाचारी बन सके। उपरोक्त जानकारी गुणायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने दी।

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