ज्ञान, साधना और विनम्रता की त्रिवेणी थे आचार्य ज्ञानसागर महाराज : मुनि प्रमाण सागर।
SHIKHAR DARPANSaturday, May 16, 2026
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गिरीडीह,शिखर दर्पण संवाददाता।
तीर्थराज सम्मेद शिखर जी में विराजमान मुनि प्रमाण सागर महाराज ने आचार्य विद्यासागर जी महामुनिराज के गुरु आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज के सल्लेखना समाधि दिवस पर गुणायतन परिसर में आयोजित विनयांजलि सभा को संबोधित करते हुए कहा कि आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज ज्ञान, साधना और विनम्रता की अद्भुत त्रिवेणी थे। उनका जीवन भारतीय सभ्यता और जैन परंपरा के लिए प्रेरणास्रोत है। गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि अमावस्या के अवसर पर भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी का अभिषेक एवं शांतिधारा संपन्न हुई तथा आचार्य ज्ञानसागर महाराज का समाधि दिवस श्रद्धापूर्वक मनाया गया। इस अवसर पर झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं वर्तमान नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी गुरु चरणों में उपस्थित हुए और मुनि श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया।
सभा को संबोधित करते हुए मुनि प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि यदि समाज को आचार्य विद्यासागर जी महाराज जैसे युगपुरुष मिले, तो उसके मूल में आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज की तपस्या, संस्कार और साधना रही है। उन्होंने जैन साहित्य, दर्शन और अध्यात्म को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। मुनि ने बताया कि अध्ययन काल में एक विद्वान द्वारा जैन साहित्य को लेकर की गई टिप्पणी ने आचार्य ज्ञानसागर जी के मन को झकझोर दिया था। इसके बाद उन्होंने संकल्प लिया कि वे ऐसा साहित्य रचेंगे जिसे देखकर पूरा संसार आश्चर्य करेगा। बाद में बनारस के विद्वान अम्बा प्रसाद शास्त्री के सान्निध्य में अध्ययन कर उन्होंने स्वाध्याय के बल पर बीसवीं शताब्दी के महान विद्वानों में अपना स्थान बनाया। आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज ने “जयदेव”, “वीरोदय”, “सुदर्शनोदय” एवं “समुद्रदत्त चरित्र” जैसे महाकाव्यों की रचना कर जैन साहित्य को समृद्ध किया। विद्वानों ने उनकी तुलना कालिदास, अश्वघोष और माघ जैसे महाकवियों से की।
उन्होंने “समयसार”, “प्रवचनसार”, “मानव धर्म” और “पवित्र मानव जीवन” जैसी कृतियों के माध्यम से जनसामान्य को अध्यात्म का सरल मार्ग बताया। मुनि ने कहा कि इतनी महान विद्वत्ता के बाद भी आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज में अहंकार का लेश मात्र नहीं था। वे स्वयं को साधक मानते थे, प्रचारक नहीं। उनकी विनम्रता का परिचय तब भी मिला जब उन्होंने अपने शिष्य आचार्य विद्यासागर जी महाराज को आचार्य पद सौंपकर स्वयं उन्हें अपना निर्यापक बनाया। अंत में मुनि प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज का जीवन यह संदेश देता है कि वास्तविक महानता ज्ञान, साधना, विनम्रता और निष्पृहता में निहित होती है। उनका व्यक्तित्व आज भी जैन समाज और साहित्य जगत को आलोकित कर रहा है।