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8 नवंबर को लोक परंपरा और 9 नवंबर को जैन परंपरा के अनुसार मनाएं दीपावली।

पीरटांड,शिखर दर्पण संवाददाता।

दीपावली कब मनाई जाए, इस जिज्ञासा का समाधान करते हुए मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि जैन परंपरा में उदयातिथि को मान्यता दी जाती है। सूर्योदय के समय जो तिथि रहती है, उसी के आधार पर पूरे दिन की तिथि निर्धारित होती है। इस वर्ष सूर्योदय के समय चतुर्दशी होने के कारण 8 नवंबर को लोक परंपरा के अनुसार दीपावली मनाई जाएगी, जबकि 9 नवंबर को जैन परंपरा के अनुसार भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण महोत्सव मनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि जैन धर्म में दीपावली भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण और उनके प्रधान शिष्य गौतम गणधर स्वामी के केवलज्ञान महोत्सव के रूप में मनाई जाती है। भगवान महावीर को कार्तिक अमावस्या के दिन निर्वाण प्राप्त हुआ और उसी दिन गौतम गणधर स्वामी को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। भगवान महावीर का मोक्ष और गौतम स्वामी का केवलज्ञान जैन समाज के लिए दीपावली का वास्तविक धार्मिक महत्व है, उन्होंने कहा भगवान रामचंद्र जी के अयोध्या आगमन से जुड़ी लोकपरंपरा का भी दीपावली में विशेष स्थान है। जैन परंपरा में भगवान रामचंद्र जी आठवें बलभद्र माने गए हैं और वह पूजनीय हैं।

मुनि श्री ने बताया कि 9 नवंबर को प्रातः भगवान की आराधना कर निर्वाण लाडू चढ़ाने का विधान है। प्रतिष्ठानों में दीपावली पूजन के लिए प्रातः लगभग साढ़े सात से साढ़े आठ बजे के बीच स्थिर लग्न का समय उपयुक्त रहेगा। इसके अतिरिक्त दोपहर लगभग दो बजे के आसपास भी स्थिर लग्न में पूजन किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अमावस्या, स्थिर लग्न और दोषरहित समय का समन्वय हो तो प्रातः लगभग 7 बजकर 20 मिनट से एक घंटे का समय प्रतिष्ठानों में पूजन के लिए सर्वोत्तम हो सकता है। मुनि श्री के इन समाधानों का मूल संदेश यही रहा कि धार्मिक पर्वों को उनकी आध्यात्मिक भावना के साथ मनाएं, धर्म को केवल बाहरी क्रियाओं तक सीमित न रखें और सम्यक दर्शन, ज्ञान तथा चारित्र के माध्यम से अपने जीवन को आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाएं।गुणायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने  बताया कि मुनि श्री से जब यह प्रश्न पूछा गया कि स्त्री मोक्ष प्राप्त कर सकती है या नहीं? इस  पर मुनि श्री ने स्पष्ट किया कि मोक्ष न स्त्री प्राप्त करती है और न पुरुष, बल्कि वह आत्मा मोक्ष प्राप्त करती है जो निर्ग्रंथ अवस्था को प्राप्त होती है। यदि स्त्री होने के कारण मोक्ष में बाधा होती तो क्या संसार के सभी पुरुष मोक्ष प्राप्त कर लेते? ऐसा नहीं है। पुरुषों में भी वही मोक्ष प्राप्त करता है जो निर्ग्रंथ होने की योग्यता हासिल करता है। स्त्री के संदर्भ में पर्यायगत मर्यादा की बात है, लेकिन उसके लिए मोक्ष मार्ग बंद नहीं है।

वह अपनी साधना और पात्रता विकसित करके मोक्ष मार्ग पर चल सकती है तथा भावांतर में मोक्ष प्राप्त कर सकती है। आज स्त्री हो या पुरुष, सभी को अपनी पात्रता और भावों के सुधार की चिंता करनी चाहिए। देव, गुरु और धर्म की सेवा करते हुए आत्मज्ञान तथा भेदविज्ञान के साथ सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र का आश्रय लेकर जीवन को आगे बढ़ाना चाहिए।राजकोट से आए एक गैर-जैन श्रद्धालु ने बताया कि वह यूट्यूब पर मुनि श्री के प्रवचन सुनकर प्रभावित हुआ और उनके दर्शन तथा वंदना के लिए आया है। उसने इस जीवन से मोक्ष प्राप्त कर दोबारा जन्म न लेने का उपाय जानना चाहा। मुनि श्री ने श्रद्धालु का जोरदार अभिनंदन करते हुए कहा कि आपके हृदय में धर्म के प्रति प्रगाढ़ अनुराग दिखाई देता है। जिस व्यक्ति के हृदय में धर्म की लौ जल जाती है, उसे मार्ग बताने की आवश्यकता नहीं रहती, वह स्वयं अपना मार्ग सुनिश्चित करने लगता है। हमें समझना चाहिए कि हम धर्म के दरबार तक तो पहुंच गए, लेकिन धर्म को कितना धारण कर पाए हैं? उन्होंने कहा कि कई बार लोग धार्मिक क्रियाओं से तो जुड़ जाते हैं, लेकिन धर्म के मूलभूत प्रयोजन से दूर रह जाते हैं। केवल धार्मिक क्रियाएं करना पर्याप्त नहीं, उनके वास्तविक उद्देश्य को समझकर जीवन में उतारना आवश्यक है। संसार से मुक्ति की प्रबल चाह जब तक हृदय में नहीं होगी, तब तक व्यक्ति मोक्ष मार्ग में पूरी तरह प्रवृत्त नहीं हो पाएगा। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र का आश्रय लेकर मोक्ष मार्ग के अनुकूल प्रवर्तन करें। इससे निश्चित रूप से हमारा संसार सिमटेगा और आत्मा परम अवस्था की ओर अग्रसर होगी।

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